व्यवसायियों के बेटों में पढ़ाई का जुनून

Siddhartha nagar Updated Fri, 23 Nov 2012 12:00 PM IST
सिद्धार्थनगर। शिक्षा की दर भले ही जिले में पचास फीसदी का आंकड़ा नहीं छू सका है, लेकिन व्यवसायियों के बेटों में पढ़ाई का जुनून है। शायद यही कारण है कि वे अपना पुश्तैनी व्यापार छोड़कर पढ़ाई को ही मुख्य ध्येय बना लिए हैं। कोई चावल के बड़े कारोबार को छोड़ असिस्टेंट प्रोफेसर बन गए हैं तो कोई राशन के कारोबार से दूर होकर कस्टम में बतौर निरीक्षक ड्यूटी कर रहे हैं। बेटियां भी कम नहीं हैं। किसी की बेटी चिकित्सा में हायर डिग्री ले चुकी हैं तो कोई बैंक में आसीन है।
जिला मुख्यालय के पुरानी नौगढ़ के व्यवसायी श्याम बिहारी जायसवाल के पुत्र शक्ति को भी व्यवसाय नहीं भाया और उन्होंने दो साल पहले अपनी काबिलियत के बल पर कानपुर देहात के राम स्वरूप ग्रामोद्योग पीजी कालेज में राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नौकरी पाई। यही हाल श्याम बिहारी की बेटी सलोनी का भी रहा। उन्होंने एमबीबीएस के बाद पीजी किया। अब वह स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में जिले में सेवा देने को तैयार हैं। उसका बाजार के व्यवसायी गोपाल अग्रहरि मूल रूप से गल्ला व्यवसाय से जुड़े हैं। इनके बेटे अरुण कुमार अग्रहरि ने व्यवसाय की अपेक्षा पढ़ाई को तवज्जो दी और इस समय वह यूनाइटेड किंगडम में पोलारिस कंपनी में बतौर साफ्टवेयर इंजीनियर तैनात हैं। कंपनी के लोग भी उन्हें बेहतर प्रोग्रामर मानते हैं। भोपाल से बीसीए और गंगटोक से एमसीए डिग्री धारक अरुण ने एक मुकाम हासिल किया है। बलिकरन जायसवाल व्यवसायी हैं। इनके बेटे राजेंद्र जायसवाल ने एक साल पहले एक्साइज विभाग में निरीक्षक के पद की नौकरी पाई। इनके छोटे भाई को इंजीनियरिंग भा गई। एनआईआईटी सूरतकाल कर्नाटक से वह बीटेक आईटी ट्रेड से कर रहे हैं। यही हाल गल्ला व्यवसाय से जुड़े आनंद छापड़िया का भी है। अच्छा खासा व्यवसाय है और इनके बेटे शुभांकर की तमन्ना पढ़- लिखकर आगे बढ़ने की है। शायद यही कारण है कि मंसूरी के वेम्बर्ग कालेज से हाईस्कूल में टाप करने के बाद वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई में जुटे हैं। यहीं के व्यवसायी सुरेश तुलस्यान की बेटी अपनी शिक्षा की बदौलत एक बैंक में अच्छे पद पर नौकरी हासिल कर ली। उसका बाजार के स्वर्ण व्यवसायी रहे स्व. सतीश चंद्र वर्मा के पुत्र संतोष कुमार वर्मा ने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और इस समय एक कंपनी में तैनात हैं। जबकि इनके दो भाई अब भी विरासत में मिले व्यवसाय को संभाल रहे हैं।

अभाव है उच्च शिक्षा केंद्रों का
सिद्धार्थनगर। जिले में उच्च शिक्षा केंद्रों का अभाव है। एमए या एमएससी के लिए जिला मुख्यालय पर कोई कालेज नहीं हैं। स्नातक तक की शिक्षा को केवल तीन कालेज हैं। चार कालेज ऐसे हैं, जो राजकीय हैं। बाकी डेढ़ दर्जन सरकार से वित्त पोषित। हाल यह है कि बेहतर शिक्षा की आस में इंटरमीडिएट के बाद छात्र या छात्रा गोरखपुर, फैजाबाद जाने को मजबूर हैं। जो पैसे वाले हैं, वे इलाहाबाद या लखनऊ पहुंच रहे हैं।

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