उसका बाजार मेें शुरू हुआ ताजियों का निर्माण

Siddhartha nagar Updated Thu, 08 Nov 2012 12:00 PM IST
उसका बाजार। जनपद में बकरीद का पर्व समाप्त होते ही मोहर्रम की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। मोहर्रम के लिए जपपद के विभिन्न स्थानों पर बेहतर और आकर्षक ढंग की ताजियों का निर्माण शुरू हो गया है। मौजूदा समय में उसका बाजार में ताजिया निर्माण का कारखाना बना हुआ है। यहां पर लगभग तीन हजार से अधिक ताजिए बनाए जा रहे हैं, जिसमें लगभग तीन दर्जन से अधिक कामगार लगे हुए हैं। उसका बाजार में निर्मित होने वाले ताजिए काफी आकर्षक होते हैं। इस लिए जनपद के अन्य स्थानों के लोग भी मोहर्रम के पर्व यहीं से ताजिए खरीदते हैं।
ताजिए का पर्व मोहर्रम आगामी 25 या 26 नवंबर को चांद दिखने के बाद तय होगा। मोहर्रम की तैयारियां जनपद में प्रारंभ हो गई हैं। विभिन्न स्थानों पर मर्सिया गाने का दौर शुरू हो चुका है तथा लोग अपने-अपने मनपसंद ताजियों का निर्माण कराने में भी जुट गए हैं। उसका बाजार इस समय ताजिया निर्माण का प्रमुख स्थान बन गया है। यहां विभिन्न स्थानों पर लगभग तीन हजार से अधिक ताजिए बनाए जा रहे हैं, जिसमें लगभग तीन दर्जन से अधिक कामगार लगे हुए हैं। ताजिया निर्माण के मामले में उसका बाजार का पुराना इतिहास है। कहा जाता है कि यहां निर्मित होने वाले ताजिए नेपाल के सीमावर्ती जनपदों तक में जाते हैं। गौरतलब हैं कि मोहर्रम का त्योहार इमाम हुसैन की शहादत के रूप में मनाया जाता है। मुस्लिम समुदाय के लोग एक माह तक इमाम साहब बाबा की चौक पर देर रात तक मर्सिया गाते हैं और उसके बाद मोहर्रम का त्योहार मनाते हैं। यह त्योहार मूलत: मातमी माना गया है। उसका बाजार में ताजिया निर्माण कार्य में जुटे नाजिर अली बताते हैं कि वह बचपन से ही ताजिया निर्माण कार्य करते हैं। ताजिया निर्माण करने से उन्हें काफी सुकून मिलता है। उनका कहना है कि ताजिए का कोई मूल्य निर्धारित नहीं होता। लोग अपनी मान्यता के अनुसार इसकी खरीददारी करते हैं। कस्बे के कुछ प्रमुख स्थानों पर बड़े ताजिए स्थापित किए जाते हैं। ताजिया निर्माण में जुटे उसका के नवाब अली का कहना है कि ताजिए दो प्रकार के होते हैं। एक बड़ा गुंबददार ताजिया तो दूसरा पूर्वी ताजिया के नाम से जाना जाता है। उनका कहना है कि अब तक ताजिए का कोई मूल्य निर्धारित नहीं रहता था, लेकिन इस बार की महंगाई को देखते हुए लगता है कि इनका मूल्य निर्धारित करना पड़ेगा। शहजाद बताते हैं कि पूर्वी ताजिए जहां 300 से लेकर 800 रुपये में उपलब्ध हो जाते हैं, वहीं बड़े और गुंबददार ताजियों की बिक्री 1500 से 3000 रुपये तक में होती है। ताजिया बनाने में जुटे इद्रीश और मुबारक बताते हैं कि इन्हें बनाने में सामग्रियां तो कम प्रयुक्त होती हैं, लेकिन शारीरिक श्रम अधिक लगता है। उनका कहना है बांस को सुखाकर उसकी पट्टियां बनाई जाती हैं और बाद में इन्हीं पट्टियों पर धागे, रंगीन कागजों तथा लेई के सहारे ताजिए को वास्तविक रूप दिया जाता है।

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