डाक्टरों को रास नहीं आ रही सरकारी नौकरी

Siddhartha nagar Updated Sat, 18 Aug 2012 12:00 PM IST
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सिद्धार्थनगर। डाक्टरों को अब सरकारी नौकरी रास नहीं आ रही है। शायद यही कारण है कि जिले के चार डाक्टरों ने रिजाइन लेटर दे दिया है। लेटर सीएमओ दफ्तर तक पहुंच गए हैं। डाक्टरों की कमी से जूझ रहे स्वास्थ्य महकमा के लिए यह बड़ी चोट है। इसके पीछे जहां सरकारी अस्पतालों में दबाव को कारण माना जा रहा है। वहीं निजी नर्सिंग होम से मिलने वाली मोटी रकम भी इस रिजाइन की एक वजह मानी जा सकती है।
एक समय था जब जिला अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ लगती थी और डाक्टर इसे समाज सेवा मानते हुए सरकार से दिए गए मानदेय को अपनाते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करते थे। पर अब परिस्थितियां थोड़ी बदल चुकी हैं। अस्पतालों के भीतर कार्य का बोझ और इलाज के अलावा अन्य सरकारी कार्यों का इतना दबाव है कि डाक्टर भी बेहाल हैं। हाल यह है कि डाक्टर सरकारी नौकरी छोड़ना ही मुनासिब समझ रहे हैं।
बता दें कि जिले में इस समय कुल 81 डाक्टरों की तैनाती है। इसमें से इटवा में तैनात रहे डा. एसके आनंद, डिढ़वा में तैनात रहे डा. विजय वर्मा, पचमोहनी के डा. प्रशांत तथा कठेला में तैनात डा. बीके यादव ने रिजाइन लेटर सीएमओ कार्यालय तक पहुंचा दिया। यानी आने वाले समय में ये सरकारी सेवा से दूर हो सकते हैं। यह तो एक बानगी भर है। पूर्वांचल के तकरीबन हर जिलों में ऐसे सरकारी चिकित्सक मिल जाएंगे, जो सरकारी सेवा से इतर अपना नर्सिंग होम या प्राइवेट सेवा देना ही मुनासिब समझते हैं।
सीएमओ डा. एसएन पांडेय कहते हैं कि किसी को नौकरी करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है। यह बात सही है कि चार लोगों ने रिजाइन लेटर दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में सेवा समाजसेवा से कम नहीं है। यहां लोगों का इलाज करके हमें मानसिक शांति भी मिलती है। फिलहाल डाक्टरों की तैनाती के लिए शासन से पत्र व्यवहार किया जा रहा है।

टेंशन और मरीज ज्यादा, सुविधाएं कम
कुछ डाक्टरों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि छत्तीस से पचास हजार रुपये महीने का वेतन तो मिलता है, लेकिन दबाव बहुत है। मरीजों की संख्या ज्यादा रहती है। अस्पतालों में डाक्टर हैं नहीं। हर्ट के विशेषज्ञ बच्चों को दवा लिखते हैं कि सर्जन तक को भी ओपीडी संभालनी पड़ जाती है। पहले जहां हर रोज सौ से दो सौ मरीज पहुंचते थे, अब यही संख्या आठ सौ का आंकड़ा पार कर जाती है। सुविधाएं भी गायब हैं। ऐसे में कुछ डाक्टरों की मजबूरी रहती है कि वे निजी नर्सिंग होम की ओर रुख करते हैं।

नर्सिंग होम से मिलती है मोटी रकम
प्राइवेट नर्सिंग होम में डाक्टरों को महज दो से तीन घंटे का ही 18 से 25 हजार रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। हालांकि यह मानदेय उनके लिए है, जो सरकारी डाक्टर हैं और गोपनीय रूप से प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। जिले में ऐसे कई नर्सिंग होम हैं, जहां यह सेवा दी जाती है। इसके अलावा एमबीबीएस और एमडी तथा सर्जन को नर्सिंग होम में सरकारी मानदेय से कहीं अधिक वेतन मद में दिया जाता है। जो अपना क्लीनिक चलाते हैं, वे भी महज कुछ घंटों में ही अच्छी खासी रकम कमा लेते हैं।

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