तिन्नी चावल की खुशबू गुम होने के कगार पर

Siddhartha nagar Updated Sun, 05 Aug 2012 12:00 PM IST
सिकरी। लोटन-मोहाना मार्ग पर फैले लगभग 500 बीघे में पैदा होने वाले तिन्नी चावल की खुशबू अब गुम होने के कगार पर है। अजाने ताल से पैदा होने वाले तिन्नी के चावल की काफी मांग थी तथा इसकी खरीददारी करने के लिए दूर-दूर से व्यापारी आते थे।
सिकरी क्षेत्र में अजाने ताल से पैदा होने वाले इस चावल की पैदावार बिना बोये ही प्रति वर्ष होती थी। यहां से जुड़े हुए लगभग दो दर्जन परिवारों की रोजी-रोटी इसी से चलती थी। अब धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले इस चावल की उपज कम हो रही है। सनातन धर्म में तिन्नी के चावल का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि इस चावल की खेती नहीं होती, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से पैदा होता है। प्राकृतिक रूप से उगने के कारण ही व्रत आदि में फलाहार के रूप में इसका सेवन किया जाता है। बाजार में इस चावल की कीमत अपेक्षाकृत अन्य चावलों से कई गुना अधिक होती है। कीमत अधिक होने के साथ-साथ इसके औषधीय गुण भी होते हैं। तिन्नी के चावलों में आयरन की मात्रा अधिक होती है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा को संतुलित रखता है। चावल की इन्हीं खूबियों के कारण इसका उपयोग दवाओं के निर्माण में भी होता है। यह चावल बड़े-बड़े तालों में स्वयं ही उगता है। क्षेत्र का अजान ताल इसमें से एक है, जो तिन्नी के चावल की प्राकृतिक खेती के लिए कई दशकों से काफी प्रसिद्ध है। यहां कभी भारी मात्रा में तिन्नी के चावल की पैदावार होती थी। 500 बीघे क्षेत्र में फैले इस ताल में उगने वाले तिन्नी के चावल से अजाने गांव के अलावा कपिया, परमा, निबिहा आदि गांवों के दर्जनों किसान लाभ प्राप्त करते थे। ताल से धान निकालने में भी किसानों को खाफी मशक्कत उठानी पड़ती है। कपिया गांव के किसान रामवृक्ष बताते हैं कि अक्टूबर से नवंबर माह के बीच तिन्नी की फसल में दाने पड़ने प्रारंभ हो जाते हैं। दाना पड़ते समय फसल को बचाने के लिए बालियों को आपस में बांधना पड़ता है। बाद में इन्हीं दानों को निकालकर सुखाने के बाद इनकी बिक्री होती है। उनका कहना है कि पिछली बार की अपेक्षा इस बार उपज काफी कम हुई है। कुल मिलाकर कभी किसानों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने वाली तिन्नी के चावल की खेती अजाने ताल से समाप्त हो रही है। इस संबंध में अपर जिला कृषि अधिकारी वीपी पाठक का कहना है कि तिन्नी का धान लोकल वेराइटी है। इस पर कृषि विभाग विशेष ध्यान नहीं दे सकता, लेकिन इसके औषधीय गुणों के आधार पर इसे बढ़ावा मिलना चाहिए।

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