विलुप्त हुए झूले, बिसार दी गई कजरी

Siddhartha nagar Updated Sat, 21 Jul 2012 12:00 PM IST
सिद्धार्थनगर। सावन शुरू होते ही पेड़ों की डाल में पड़ने वाले झूले तथा गाई जाने वाली कजरी अब आधुनिक परंपरा और जीवन शैली में विलुप्त सी हो गई है। अब से महज एक दशक पहले सावन शुरू होते ही गांवों में कजरी की जो जुगलबंदी होती थी, वह अब कहीं नहीं दिख रही है। घर की महिलाएं और युवतियां भी कजरी गाते हुए झूले पर नजर आती थीं, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं है।
जिले में सावन शुरू होते ही कजरी के बोल और झूले गांव-गांव की पहचान बन जाते थे। झूला पड़ै कदंब की डाली, झूलैं कृष्ण मुरारी ना... के बोल से शुरू होने वाली कजरी दोपहर से शाम तक झूले पर चलती रहती थी। कजरी के गायन में पुरुष भी पीछे नही थे। दिन ढलने के बाद गांव में कजरी गायन की मंडलियां जुटती थीं। देर रात तक कजरी का दौर चलता था। जिले के डुमरियागंज, इटवा तथा बांसी आदि क्षेत्र के दर्जनों गांव ऐसे हैं, जहां कभी कजरी की खासी धूम हुआ करती थी, लेकिन अब इसको जानने वाले लोग काफी कम हैं। इटवा निवासी बुजुर्ग रामतेज कभी कजरी के लिए दूर दराज के जिलों में मशहूर थे। सावन में इनकी गायन मंडली जिले के अन्य हिस्सों में भी लोगों को अपने गीतों से मंत्रमुग्ध कर देती थी, लेकिन अब यह सब समाप्त हो चुका है। रामतेज बताते हैं कि आधुनिक समय में लोग अब टीवी, सिनेमा की ओर ध्यान देते हैं, जिसके चलते लोक गायन उपेक्षित हो गया है। पहले सावन के महीनों में कजरी को गाकर उनकी गायन मंडली अच्छा पैसा कमा लेती थी, लेकिन अब कजरी के शौकीन लोग नहीं रहे। कजरी के शौकीन मन्नन दूबे बताते हैं कि सावन में धान की रोपाई के समय महिलाओं का समूह कजरी गाने के लिए काफी प्रसिद्ध था। दिन ढलने के बाद गायन कला में निपुण कलाकार भी अपनी तान से कजरी की लहरियां बिखेरा करते थे, लेकिन अब तो न सावन में झूले हैं और न ही कजरी के बोल।

लोकगीत की धरोहर है कजरी
सांस्कृतिक संस्था नवोन्मेष के अध्यक्ष विजित सिंह का कहना है कि कजरी लोकगीतों की धरोहर है। कुछ वर्षों तक कजरी गाने वाले कलाकार जिले में मौजूद थे, लेकिन अब इनकी संख्या गिनी चुनी रह गई है। सरकार को लोक कलाओं के संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए, जिससे लोक संस्कृति और परंपराएं जीवित रह सकें। वह अपनी संस्था के माध्यम से ऐसे कलाकारों की जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं, जो इन लोक कलाओं से जुड़े रहे हों।

सोन चिरैया भी जगा रही अलख
भोजपुरी गायिका मालिनी अवस्थी सोन चिरैया नाम से अपने ब्लाग के माध्यम से लोक कला और संस्कृतियों के संरक्षण की अलख जगा रही हैं। उन्होंने अपने ताजे पोस्ट में लिखा है कि अपने यहां भले ही पारंपरिक लोकगीतों का महत्व कम हो रहा है, लेकिन विदेशों में अब भी इनकी धूम है। भारत के बाहर सूरीनाम, त्रिनिदाद, मारिशस आदि देशों में भारतवंशी पारंपरिक लोेेकगीतों को अब भी काफी चाव से सुनते हैं। उन्होंने लिखा है कि कुछ दिन पहले वह फिजी गई थीं। उस समय सावन नहीं शुरू हुआ था, लेकिन वहां के लोगों ने कजरी सुनने की इच्छा प्रकट की। जब विदेशों में पारंपरिक लोकगीतों की धूम मचा सकती है तो अपने यहां क्यों नहीं।

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