बाढ़ से बचने को नए ठौर की तलाश शुरू

Siddhartha nagar Updated Fri, 20 Jul 2012 12:00 PM IST
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बांसी। बरसात शुरू होते ही राप्ती और बूढ़ी राप्ती के तट पर बसे एक दर्जन गांवों के ग्रामीणों ने बाढ़ से पहले नए ठौर की तलाश शुरू कर दी है। इन गांवों के ग्रामीणों ने आस-पास के तटबंधों पर घास-फूस का छप्पर बनाकर और पन्नी तानकर अस्थायी आशियाना बनाना शुरू कर दिया है।
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इस बार मानसून भले ही विलंब से आया है, लेकिन नदियों के तट पर बसे ग्रामीणों को बाढ़ का भय सताने लगा है। बांसी तहसील क्षेत्र से गुजरने वाली राप्ती और बूढ़ी राप्ती नदी के तट पर बसे लगभग एक दर्जन गांवों की यही कहानी है। इन गांवों के लोग हर वर्ष बाढ़ की त्रासदी से निपटने के लिए दो आशियाना बनाते हैं। एक गांव में और दूसरा बांध पर। बरसात के दिनों में ग्रामीणों का बसेरा बांध पर बन जाता है। बाढ़ आने पर ये गांव टापू बन जाते हैं और यहां के लोग इससे बचने के लिए अपने पशुओं के साथ बंधे पर डेरा डाल देते हैं। बूझी राप्ती के तट पर बसे गांव भगौतापुर, डड़िया, भटौली और महुआरी नदी का जलस्तर बढ़ते ही वीरान हो जाते हैं। इन गांवों के निवासी जीते, चुन्नीलाल, उदयराज का कहना है कि तिनका-तिनका जोड़कर वह अपनी जिंदगी की गाड़ी खींचते हैं, पर बाढ़ एक ही झटके में उन्हें बर्बाद करके चली जाती है। भगौतापुर गांव के लगभग आधा दर्जन ग्रामीणों के आशियाने पिछले वर्ष आई बाढ़ के कारण नदी में विलीन हो गए, लेकिन ये लोग गांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इनका कहना है कि बाढ़ तो अब हमारी नियति बन चुकी है। यही हाल राप्ती नदी के तट पर बसे गुल्हरिया राजा, डड़वाघाट, बभनपुरवा आदि गांवों का भी है। नदी और तटबंध के बीच इनके गांव हैं, जो हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। बावजूद इसके ये लोग गांव छोड़कर अन्यत्र बसने को तैयार नहीं हैं। अभी बाढ़ जैसा कोई नजारा नहीं दिख रहा है, लेकिन इन गांवों के लोग इसे लेकर पूरी तरह सतर्क हैं। इस बारे में उपजिलाधिकारी बांसी सुरेंद्र दास पटेल का कहना है कि बाढ़ से निपटने की तैयारियां पूरी हैं। राप्ती और बूढ़ी राप्ती नदी पर 20 बाढ़ चौकियां बनाकर वहां कर्मचारियों को तैनात कर दिया गया है। इन नदियों के जलस्तर की रिपोर्ट प्रतिदिन मंगवायी जा रही है। नदियों तथा तटबंधों के बीच बसे गांवों पर खास नजर रखी जा रही है।
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