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एम्स को रिसर्च के लिए मिलेगी संजीवनी

Siddhartha nagar Updated Fri, 08 Jun 2012 12:00 PM IST
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सिद्धार्थनगर। एक रिटायर्ड इंजीनियर के जज्बे को सलाम। रिसर्च के लिए बाडी की कमी से जूझ रहे मेडिकल कालेजों तथा देश के सर्वोच्च मेडिकल सेंटरों के लिए एक कदम इस बुजुर्ग ने बढ़ाए हैं। यदि राष्ट्रपति से मंजूरी मिल गई तो इस रिटायर्ड इंजीनियर का शरीर रिसर्च के लिए मेडिकल जगत को मिल जाएगा। पर इंजीनियर की शर्त है कि यह बाडी एम्स को मिले, ताकि चिकित्सकों को न रिसर्च में दिक्कत हो और न ही विदेश पर निर्भरता रहे। यह बुजुर्ग जनपद के परसा बुजुर्ग थाना उसका बाजार के रहने वाले हैं।
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परसा बुजुर्ग में एक दिसंबर 1942 को अचरज दूबे के घर केके दूबे का जन्म हुआ। शुरू से ही वह होनहार रहे। वर्ष 1960 में कलावती से उनका विवाह हुआ और विवाह के दौरान ही उन्होंने एक जुलाई 1964 को सरकारी सेवा पाई। गोरखपुर के एमपी पालीटेक्निक से वर्ष 1964 में डिप्लोमा लेकर वह सरकारी सेवा में आ गए। पीडब्ल्यूडी में अवर अभियंता के रूप में कार्य किए और 30 नवंबर 2000 को रिटायर हो गए। सरकारी सेवा के दौरान कई जनपद उनके कार्य क्षेत्र रहे, लेकिन मिर्जापुर जनपद का सेवाकाल उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट रहा। बकौल केके दूबे मिर्जापुर जनपद में गरीबों की सेवा का उन्होंने व्रत लिया। समाज के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा यही से उन्हें मिल गई। इस बीच वह नौकरी से रिटायर हो गए। पत्नी कलावती का निधन हो गया। तीन बेटों में पुष्प पीडब्ल्यूडी में और दूसरे पुत्र कृष्ण प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर हैं। तीसरा बेटा टीचिंग का कार्य करता है।

शरीर रिसर्च के लिए दान देने की प्रेरणा के सवाल पर उनका कहना है कि एक माह पहले वह खाना खाने के तत्काल बाद बेहोश हो गए। उन्हें किसी प्रकार चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई गई। इस अवधि में उनके मन में विचार आया कि मौत के बाद शरीर को जला दिया जाता है, जो किसी काम का नहीं रह जाता है। जबकि यदि इस शरीर को चिकित्सा जगत को सौंपा जाए तो इससे अन्य लोगों के दुखों को दूर किया जा सकता है। उनका कहना है कि उनकी मौत के चौबीस घंटे के भीतर शरीर एम्स को मिले। उनकी आंख भी दान कर दी जाए। उन्होेंने इसके लिए राष्ट्रपति के साथ ही प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी से इस आशय की स्वीकृति मांगी है।

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