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जिले में मौत बांट रहा पर्यावरण प्रदूषण

शामली, अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 05 Jun 2017 12:30 AM IST
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environmental pollution
environmental pollution - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

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शामली। प्रदूषण के कारण पानी पीने लायक नहीं बचा, भूगर्भ जल बेहद नीचे चला गया है, तो हवा में जहर घुला हुआ है। पौधारोपण की औपचारिकता होती है, मगर पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं बरती जा रही। नतीजा यह है कि जिले के 37 गांवों का पानी पीने लायक नहीं है। बीओडी (बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड) पानी में घटा हुआ है। ऐसे में स्वच्छ पर्यावरण की कल्पना बेमानी साबित हो रही है। 
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कहने को गंगा और यमुना दोआब के बीच बसे शामली जनपद में खेत खलिहान खूब हैं, लेकिन हरियाली का अभाव है। सड़कों के किनारे खड़े पेड़ काट दिए जाते हैं, तो नई कॉलोनियों को विकसित करने के लिए भी पेड़ों पर आरा चला दिया गया। ऐसी स्थिति में पर्यावरण को गहरा खतरा पहुंचा।


चौंकाने वाली बात यह है कि जिले के शामली, कैराना, ऊन, कांधला और थानाभवन ब्लाक डार्क जोन घोषित हैं। इन सभी ब्लाक क्षेत्रों में भूगर्भ जल करीब 20 मीटर पर पहुंच गया है।

इसके अलावा खटारा वाहन, खेतों में जलाई जा रही पुराल, मेकेनिकों द्वारा काले ऑयल के जलाने से वायु प्रदूषण को बढ़ावा मिल रहा है। उधर, शामली नगर पालिका परिषद के चेयरमैन अरविंद संगल ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से उन्होंने   हाउस टैक्स समय पर जमा कराने वालों को पौधा सहित गमला वितरित की योजना शुरू कराई। सितंबर 2016 से अब तक 1500 गमले वितरित किए जा चुके हैं।        इसके अलावा विभिन्न कॉलोनियों   में घरों के बाहर पौधारोपण कराकर ट्री गार्ड भी लगवाए गए।

37 गांवों का पानी नहीं है पीने लायक 
एनजीटी (राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण) ने पूर्व में यह रिपोर्ट जारी कर कहा था कि शामली जिले के करीब 37 गांवों में हैंडपंपों का पानी पीने लायक नहीं रहा है। सैकड़ों हैंडपंप चिह्नित कर उन्हें उखाड़ने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद हैंडपंपों को चिह्नित कर लाल निशान भी लगाए गए, लेकिन सभी हैंडपंपों को उखाड़ा नहीं जा सका। इतना ही नहीं, चिह्नित गांवों में वैकल्पिक तौर पर पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था भी नहीं हो सकी। हालांकि गांवों में पेयजल आपूर्ति के लिए परियोजना तो बनी, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं हुआ। 

 प्रदूषित कृष्णा नदी बांट रही मौत 
सहारनपुर से निकली कृष्णा नदी शामली जनपद में होते हुए बागपत के बरनावा में हिंडन नदी में जाकर मिलती है। कृष्णा नदी सहारनपुर के रामपुर मनिहारन से ही प्रदूषित हो जाती है, क्योंकि वहां फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषित पानी इसी नदी में छोड़ा जाता है। फिर शामली में आकर कस्बों और गांवों के दूषित पानी के साथ ही फैक्ट्रियों का पानी इसमें डाला जा रहा है। आलम यह है कि कृष्णा नदी जहरीली होने के साथ ही बीमारियां बांट रही हैं। जलालाबाद क्षेत्र में कृष्णा नदी बसे गांव चंदेनामाल, दभेडी सहित कई गांवों में कैंसर पांव पसार रहा है। 

पौधरोपण के बाद नहीं रखा जाता ख्याल
बीते वर्ष प्रदेश सरकार के निर्देश पर पौधारोपण के लिए विशेष अभियान चलाया गया था। शामली जिले में वन विभाग ने करीब ढाई लाख पौधों का रोपण किया था, मगर उनका ख्याल किसी ने नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि कैराना क्षेत्र के बरनावी और झिंझाना क्षेत्र में भूमाफियाओं ने वन विभाग की जमीन पर रौपे गए पौधों को केमिकल डालकर नष्ट कर दिया। कैराना कोतवाली में इसको लेकर रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई थी। 

बंद नहीं हुआ पॉलीथिन का प्रयोग
पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से ही पॉलीथिन के प्रयोग को पूरी तरह बंद करने के लिए एनजीटी ने आदेश दिया था। इसके बावजूद बाजारों में खुलेआम पॉलीथिन की बिक्री होती   है। सब्जी, फल और कपड़ा विक्रेताओं के यहां पॉलीथिन बैग ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इस वजह से नाले नालियों में पॉलीथिन भरी होने के कारण नाले नालियां जाम हो जाती हैं, जलभराव की समस्या झेलनी पड़ती है। 

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