सूख रहीं नदियां, खत्म हो रहे कुएं-तालाब

Shahjahanpur Updated Mon, 05 May 2014 05:31 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
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शाहजहांपुर। कुछ दशक पहले तक हमारी निर्भरता नदियों, तालाबों और कुओं पर थी। दौर बदला तो तरीके बदल गए, सो इन प्राकृतिक श्रोतों का हमने अंधाधुंध दोहन शुरू कर दिया। हालत यह है कि तालाब सूख गए हैं, धीरे-धीरे लोगों ने उन पर कब्जा करना शुरू कर दिया। सरकारी तंत्र ने इन्हें सुधारने का काम शुरू तो किया, मगर धन की अनुपलब्धता ने हाथ बांध दिए। ऐसे में व्यक्ति की पूरी निर्भरता भूगर्भ जल पर रह गई है, आज देहात में भी संपन्न लोग घरों में सबमर्सिबल लगा रहे हैं, किसी का ध्यान इस कीमती जल को बचाने पर नहीं है। आइए बताते हैं कि क्या हालत है इन प्राकृतिक श्रोतों की-


गर्रा और खन्नौत के तटों
पर डाला जा रहा कचरा
कहने को गर्रा और खन्नौत नदियों की गोद में यह शहर बसा है। इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा के अनुसार देश को आजादी मिलने से दशकों पहले जब सड़क यातायात के संसाधन आज जैसे विकसित नहीं हुए थे, उन दिनों माल की ढुलाई के लिए यही नदियां जल परिवहन का प्रमुख होती थीं। नावों के जरिए फर्रुखाबाद और कानपुर तक व्यावसायिक गतिविधियां चलती थीं, लेकिन इसे शहर के लोगों की कृतघ्नता कहें अथवा प्रकृति प्रदत्त उपहार का दुरुपयोग कि अब यही नदियां प्रदूषण का पर्याय बन गई हैं। अरसे से दोनों नदियों के तटों को डलावघर में तब्दील करके वहां शहर का कचरा डाला जा रहा है। रही-बची कसर फ्लड जोन में आने वाले नदी तटों के आसपास रिहायशी आवास बनाकर पूरी की जा रही है।



प्यास बुझाने लायक
नहीं रहा छाया कुआं
तीन-चार दशक पहले तक राहगीरों का गला तर करने के लिए सड़कों के किनारे बने कुएं बहुत काम आते थे। शहर में भी ऐसे कुओं की न केवल सार्वजनिक स्थलोें, बल्कि घरों में भी भरमार होती थी। वक्त बदला तो पीने केे पानी के संसाधन भी बदल गए। हैंड पंपों का जमाना आया तो सबसे पहले घरों के कुएं पाटे जाने लगे। कई मंदिरों और मजारों के कुएं पाटकर वहां पक्के निर्माण कर लिए गए। हाल ही में जजी कैंपस में पुराने कुएं को पाटकर वहां वकीलों के चैंबर बना दिए गए। पुवायां के छावनी मोहल्ले में गढ़ी गेट के सामने दर्जनोें घरों की प्यास बुझाने वाले कुएं का इसी तरह लोप हो चुका है। शहर में केरूगंज-जेल रोड के बिसरात तिराहे पर छतरी वाले कुएं की वजह से इलाका छाया कुआं के नाम से मशहूर हो गया। यह अलग बात है कि बरसों से सफाई न होने से छाया कुआं भी अब प्यास बुझने लायक नहीं रहा।



प्राकृतिक तालाबों की
जमीन कब्जाने की होड़
ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के साथ पशुओं की प्यास बुझाने में अहम् भूमिका निभाने वाले प्राकृतिक तालाबों पर लोगों की निगाह उन्हें उथला और समतल बनाने पर आमादा है। देहात क्षेत्र को जाने दें, शहर के बीच मल्हार रोड से तारों वाले बाग की ओर जाने पर दाईं ओर पड़ने वाले तालाब के नाम पर क्षेत्र पक्का तालाब के नाम से मशहूर हो चुका है, लेकिन वहां भयंकर गंदगी होने और कूड़ा-कचरा डाले जाने से तालाब सिकुड़कर अंतिम सांसें गिन रहा है। कुछ लोग चाहते भी यही हैं कि तालाब का निशान मिटे और जमीन उनके कब्जे में आ जाए। पांच साल पहले ग्राम पंचायत स्तर पर विकसित किए गए 922 आदर्श तालाबों की स्थिति भी कम दयनीय नहीं है। तालाब खुदवा दिए गए, लेकिन उन्हें पानी से लबालब करने के लिए सरकारी तंत्र मानसून का मुंह ताकता है।




445 तालाबों का मनरेगा से हुआ उद्घार
गत वर्ष पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर मनरेगा के बजट से आदर्श तालाबों के जीर्णोद्घार का अभियान शुरू किया गया था। इसके तहत 445 तालाबों की सिल्ट सफाई के साथ वहां तारों की बाड़ लगाने का काम हुआ और हरियाली बढ़ाने के लिए पौधरोपण भी हुआ। शेष बचे तालाबों का उद्घार कब होगा, कुछ पता नहीं। सरकारी तंत्र की दिक्कत यह है कि मनरेगा में बजट की धनराशि होने पर ही यह काम कराना संभव है। बजट राशि जल्द नहीं मिली और मानसून आ गया तो तालाबों की सफाई एक साल फिर पिछड़ जाएगी।




गोमती भी हो गई
प्रदूषण का शिकार
- सहायक नदी भैंसी, कठिना, झुकना की धार ठहरी
अमर उजाला ब्यूरो
पुवायां। इंद्र भगवान को गौतम ऋषि के श्राप से मुक्ति दिलाने वाली गोमती नदी सिसक रही है। पीलीभीत जनपद के माधोटांडा कस्बे के पास (गोमत ताल) फुलहर झील से शुरू होकर शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर, मिश्रिख, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर, वाराणसी आदि से गुजरकर 960 किमी का सफर तय कर बनारस गाजीपुर के बीच मार्कण्डेय आश्रम के पास तक जाने वाली यह नदी अब प्रदूषण के चलते उसकी सांस घुट रही है। कुछ लोग नदी की धार तक पर अवैध कब्जा कर उसका अस्तित्व मिटाने पर तुले हैं। नदी की धार तक खेती होने के कारण इसकी धार अब मंद पड़ने लगी है।
गोमती की सहायक भैंसी, कठिना और झुकना नदी भी अतिक्रमण और अवैध रूप से तटों पर कब्जा कर की जा रही खेती से अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। भैंसी नदी की धार रुक चुकी है, कठिना भी कई स्थानों पर सूखकर नाले का रूप ले चुकी है। तमाम स्थानों पर नदी तट तक कब्जा कर खेती की जा रही है तो घरों का मलवा और गंदगी नदी में डालकर उसका दम घोटने का प्रयास किया जा रहा है। अवैध खनन से भी नदियों को गहरे घाव दिए जा रहे हैं।
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