स्टेशनों की सुरक्षा को रेल प्रशासन बेपरवाह

Shahjahanpur Updated Sat, 08 Dec 2012 05:30 AM IST
संदर्भ: आंवला और दबतरा स्टेशन की वारदातें
- दिन ढलते ही छोटे स्टेशनों पर पसर जाता है अंधेरा
- गाड़ी की रवानगी के बाद नहीं चलाए जाते जेनरेटर
- मेन रूट सहित ब्रांच लाइनों के कई स्टेशन असुरक्षित
सिटी रिपोर्टर
शाहजहांपुर। आंवला रेलवे स्टेशन पर डकैती की वारदात ने एक बार फिर जिला मुख्यालय के आसपास के स्टेशनों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल यह है कि मुख्यालय से दूरस्थ तमाम छोटे स्टेशन दिन ढलने के बाद अंधेरे और सन्नाटे में डूब जाते हैं। वहां न तो यात्रियों के जान-माल की हिफाजत का बंदोबस्त रहता है और न ही रेल संपत्तियों की सुरक्षा का कोई इंतजाम।
अभी दो माह नहीं बीते जब बदायूं के दबतरा स्टेशन पर बदमाशोें ने धावा बोलकर लूटपाट की थी। इस घटना से उत्तर रेलवे प्रशासन ने कोई सबक लिया तो अब तक छोटे स्टेशनों की सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद हो गई होती। अब आंवला स्टेशन पर डाका पड़ने के बाद एक बार फिर जिले के उन सभी स्टेशनों की सुरक्षा समीक्षा किए जाने की जरूरत है जहां से आरपीएफ और जीआरपी बहुधा दूर रहती है।
उत्तर रेलवे के लखनऊ-बरेली मेन रूट समेत सीतापुर ब्रांच लाइन और पूर्वोत्तर रेलवे की पीलीभीत ब्रांच पर करीब एक दर्जन ऐसे ही स्टेशन हैं, जहां रात में ट्रेनेें गुजरने के बाद सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। रोशनी के लिए ब्रांच लाइनों के सभी स्टेशनों पर हैवी ड्यूटी जेनरेटर लगाए गए हैं, लेकिन वे चलते तभी हैं जब ट्रेन के आने-जाने का टाइम होता है। दरअसल, इलेक्ट्रानिक सिग्नल ऑन करने को ही जेनरेटरों का इस्तेमाल होता है।
मेन रूट पर भी तमाम ऐसे स्टेशन हैं, जहां ट्रेनों की लगातार आवाजाही होने से जेनरेटर बंद नहीं रहते, फिर भी सुरक्षा का संकट वहां भी बना रहता है। जीआरपी और आरपीएफ के पास जो फोर्स उपलब्ध है, उससे सभी ट्रेनों मेें रनिंग स्क्वाड चला पाना संभव नहीं। सो जीआरपी और आरपीएफ के सशस्त्र जवान केवल उन्हीं गिनी-चुनी ट्रेनों में चलते हैं जो वीआईपी श्रेणी की हैं या फिर जिनके रूट खतरनाक हैं।

असुरक्षित स्टेशन: एक नजर
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0 मीरानपुर कटरा
0 तिलहर
0 ऐगवां
0 कहिलिया
0 पं. रामप्रसाद बिस्मिल नगर
0 बंथरा
0 शहबाजनगर
0 बरतारा
0 ऊंचौलिया
0 जंग बहादुरगंज
0 जहानीखेड़ा
0 मैगलगंज


‘छोटे स्टेशनों की सुरक्षा संबंधी कमियों के बारे में अधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। छोटे स्टेशनों को जाने दें, मंडल में सर्वाधिक दो करोड़ रुपये की मासिक आमदनी देने वाले अपने शहर के स्टेशन पर बहुत पहले मेटल डिटेक्टर लगाया गया जो बाद में हट गया। आरपीएफ और जीआरपी के पास हैंडी मेटल डिटेक्टर हैं और उनका इस्तेमाल भी हो रहा है।’
-एके गौतम, स्टेशन अधीक्षक

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