किवदंती बने शिक्षासेवी शर्मा जी

Shahjahanpur Updated Wed, 05 Sep 2012 12:00 PM IST
शाहजहांपुर। ‘शिक्षकों के लिए छात्र दत्तक पुत्र के समान होता है, इसलिए गुरुजनों को चाहिए कि वे विद्यार्थियों को पुत्रवत मानकर ही उन्हें ज्ञान प्रदान करें और उन्हें सद्मार्ग पर अग्रेषित करें’ महात्मा बुद्ध के इस कथन ने श्रीकृष्ण शर्मा का तो जीवन ही बदल दिया। उन्होंने सामर्थ्य रहने तक शिक्षक कार्य करने का संकल्प ले लिया और उसे पूरी निष्ठा तथा ईमानदारी से निभा भी रहे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में किवदंती बन चुके शर्मा जी विकास खंड कांट के एक छोटे से गांव मोहनपुर में रहते हैं। पिता मथुरा प्रसाद और माता कृष्ण प्यारी के आदर्शों को आत्मसात करते हुए उन्होंने बेसिक शिक्षा विभाग में नौ जुलाई 1954 को बतौर सहायक अध्यापक शिक्षक कार्य शुरू किया। हिंदी से एमए करने के दौरान उन्हें महात्मा बुद्ध के आदर्श शर्मा जी में गहरे तक पैठ कर गए, जिन्हें उन्होंने जीवन का हिस्सा बना लिया और छात्र-छात्राओं को पुत्रवत मानते हुए उन्हें शिक्षित करने में जुट गए।
विभाग को 41 साल की सेवाएं देने के बाद वे पूर्व माध्यमिक विद्यालय कांट से प्रधान अध्यापक पद से 30 जून 1995 को सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन महात्मा बुद्ध की प्रेरणा से उऋण नहीं हो सके। इसलिए उन्होंने रिटायरमेंट के दिन ही संकल्प लिया कि जब तक उनमें सामर्थ्य रहेगी तब तक वह स्कूल जाकर बच्चों ज्ञान दान करते रहेंगे। बकौल शर्मा जी उन्हें बच्चों के प्रति अगाध स्नेह है। यही मोह उन्हें शिक्षा से विरत नहीं होने देता। वह रिटायरमेंट के 17 साल बाद भी उसी स्कूल में अपने गांव मोहनपुर से लगभग दस किलोमीटर साइकिल से यात्रा करके नियमित शिक्षण कार्य के लिए आते हैं।
वह हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी दक्ष हैं इसीलिए घर पर हाई स्कूल और इंटर के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने में गुरेज नहीं करते। 77 की उम्र में वे कहते हैं कि यदि वह भी अन्य लोगों की तरह सेवानिवृत्त होने के बाद घर बैठ जाते तो शरीर शिथिल हो जाता और तमाम व्याधियां उन्हें घेर लेतीं। श्री शर्मा की प्रेरणा स्त्रोत उनकी पत्नी रामबेटी ही हैं। वह भी उनका उत्साह वर्धन करती रहती हैं और खुश हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि 1994 में राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए आवेदन किया था मगर, राजनीति के चलते वह इस गरिमामयी पुरस्कार से वंचित रह गए। आज उन्हें इसका कोई दुख भी नहीं है, क्योंकि उन्हें समाज से भरपूर मान सम्मान जो मिल रहा है।

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