कौन जीते सोने-चांदी के पदक

Shahjahanpur Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
न खेलने को मैदान है, न ही खिलाने को प्रशिक्षक
- खेलों में राजनीतिक दखलंदाजी ने भी डुबोई लुटिया
सिटी रिपोर्टर
शाहजहांपुर। ‘बड़े बे-आबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले’ ये कहावत लंदन ओलंपिक में सवा करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने गए खिलाड़ियों के दल पर सटीक बैठ रही है। ओलंपिक में जिस-जिस खिलाड़ी से एक अदद पदक की आस लगाई गई, उसने अगले ही मुकाबले में वह आस तोड़ दी और शर्म से सिर झुकाए हमारे ‘रणवांकुरे’ मैदान से बाहर निकलते रहे। नामी-गिरामी खिलाड़ियों के अप्रत्याशित प्रदर्शन कहीं न कहीं खेलों की नर्सरी कमजोर होने की ओर इशारा कर रहे हैं।
वैसे सरकार ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए खेल एवं शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है, लेकिन इससे समस्या का समाधान होना नाकाफी है। कारण यह कि कॉलेजों के पास न तो अपने खेल मैदान हैं और न ही कुशल प्रशिक्षक। अब बिना मैदान और प्रशिक्षक के अनिवार्य विषय क्या करे। अपने जनपद की तो स्थिति बहुत ही खराब है। बता दें कि एबी रिच इंटर कॉलेज का अपना खेल मैदान है, जो कॉलेज से दूर तो है ही साथ ही मैदान पूर्ण रूप से घासविहीन है। कंकरीट से पटे मैदान में कॉलेज के छात्र तो खेलने जाते ही नहीं, हां मुहल्ले के कुछ बच्चे जरूर ऊधम काटते देखे जा सकते हैं।
इसी तरह राजकीय इंटर कॉलेज का मैदान है, जो रामलीला मैदान से जाना जाता है। यहां कभी खेलों के आयोजन नहीं होते, बल्कि राजनैतिक रैलियां और धरना-प्रदर्शन ही होते रहते हैं। राजकीय स्टेडियम शहर से इतनी दूर है कि वहां स्कूली बच्चे जाने से कतराते रहते हैं। यहां तक जाने को कोई साधन भी नहीं है।
अब ऐसी परिस्थितियों में खिलाड़ी कहां से तैयार हों। बेसिक से लेकर माध्यमिक तक खेल मैदानों और प्रशिक्षकों का अभाव है। केवल खेलकूद रैलियों में ही विद्यार्थियों को किस्मत आजमाते देखा जा सकता है। यहां भी वे राजनीति के शिकार होते रहते हैं। शिक्षकों का ध्यान खेल पर कम अपने स्कूल के बच्चे जिताने में अधिक रहता है।



‘बेसिक से लेकर ऊपर तक खेल मैदानों और कुशल प्रशिक्षकों का अभाव है। जब खेल की नर्सरी ही कमजोर होगी तो अच्छे खिलाड़ी कहां से आएंगे। ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं। जरूरत है ऐसी प्रतिभाओं को तलाशने और तराशने की। जब तक व्यवस्था में सुधार नहीं होता, तब तक किसी प्रकार के पदक की आस करना भी बेमानी है।’
- शरद कुमार सक्सेना, प्रधानाचार्य रेलवे कॉलेज रोजा



‘बड़े आयोजनों के लिए खिलाड़ियों का चयन राजनीति से प्रेरित होता है। दमखम रखने वाले होनहार खिलाड़ी रह जाते हैं। जरूरी है कि शिक्षा के साथ खेलों पर भी शुरू से ही ध्यान दिया जाए, ताकि खिलाड़ियों की नर्सरी मजबूती से फल-फूल सके। स्कूलों और स्टेडियम में अच्छे कोच नियुक्त किए जाएं। नौकरियों और स्कूलों में खेलों का कोटा भी निर्धारित हो।’
- डॉ. अमीर सिंह, प्रधानाचार्य डीएस इंटर कॉलेज

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