पानी के पाउच दे रहे हैं पेट के रोग

Shahjahanpur Updated Wed, 04 Jul 2012 12:00 PM IST
ज्यादा फायदे को व्यापारी नहीं रख रहे शुद्ध पानी के मानकों का ध्यान
- प्यूरीफायर और चिलर टैंक भी मानकों के अनुरूप नहीं
- कंटेनरों समेत करीब एक लाख पाउच होते हैं रोज सप्लाई
- फिल्टर्ड वाटर के नमूने लेने में संबंधित अधिकारी उदासीन
अनूप वाजपेयी
शाहजहांपुर। भीषण गर्मी के इस दौर में प्यास लगे तो खुश्क गले को तर करने के लिए ठंडे पानी की चाह हर किसी को होती है। ऐसे मेें अगर आप वाटर प्लांट से सप्लाई होने वाले कंटेनरों और पाउचों के पानी को तरजीह दे रहे तो कृपया पेट संबंधी रोगों से सतर्क रहें, क्योंकि ड्रिंकिंग वाटर की तिजारत करने वालों ने शुद्घता के मानकों को ताक पर रख छोड़ा है। फिल्टर्ड वाटर बताकर जो पानी शादी-ब्याह से लेकर नामकरण समारोहों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को सप्लाई होता है, उसका नमूना संबंधित अधिकारी नहीं भरते।
भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार नदियों में कल-कारखानोें के विषाक्त कचरा बहाए जाने और अन्य स्रोतों से गंदगी की मिलावट होने से सभी राज्यों के भूगर्भ जल भंडार में तमाम ऐसे रसायनों और तत्वों की मात्रा बढ़ गई है, जो कैंसर समेत तमाम लाइलाज बीमारियां दे सकते हैं। यूपी के भूगर्भ जल परीक्षण में कैल्शियम, फास्फोरस, बोरोन, सीसा जैसे घातक तत्वों की अधिकता से त्वचा रोग, घेंघा, नर्वस ब्रेक डाउन जैसी तमाम व्याधियों का खतरा मंडरा रहा है।
यही नहीं, डॉक्टर भी मानते हैं कि आज के दौर में 50 फीसदी से ज्यादा बीमारियां अशुद्घ पेयजल के सेवन से होती हैं और पीने के लिए उबला पानी इस्तेमाल करके पेट संबंधी तमाम रोगों से बचा सकता है। चिकित्सा विज्ञान के इसी निष्कर्ष को पानी के धंधेबाजों ने अपने व्यवसाय की ढाल बना रखा है। वे दावा तो यही करते हैं कि बाजार में फिल्टर्ड वाटर सप्लाई किया जा रहा है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। शहर में करीब एक दर्जन वाटर प्लांट औसतन 15 लीटर पानी वाले डेढ़ हजार कंटेनर और एक लाख पाउच रोजाना सप्लाई कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर जल संशोधन संयंत्र गंदगी से घिरे हैं।
खास यह है कि सभी धंधेबाज अपने प्लांट साफ-सुथरे बताकर व्यवसायिक प्रतिद्वंद्वियों को अशुद्घ पानी परोसने का जिम्मेदार ठहराने में कोई संकोच नहीं करते।
बहादुरगंज स्थित बालाजी मिनरल वाटर सप्लायर टोनी मोंगा छह साल से पानी के बिजनेस में हैं। बोले: पाउच सप्लायर्स आईएसआई मार्क की पैकिंग नहीं दे रहे। दुकानों पर पाउच कई दिन पड़े रहने से उनके पानी में टीडीएस लेबल भी बढ़ जाता है।
दूसरी ओर, चमकनी स्थित प्राची एक्वा सप्लायर के संचालक बब्बनप्रीत सिंह मशीन से निकलकर भीगे फर्श पर गिर रहे पानी के पाउच बटोरते हुए बोले: ग्राहकों की सेहत का ख्याल करके कारखाने में साफ-सुथरा माहौल मेंटेन कर रखा है, जबकि अन्य कई वाटर प्लांट न केवल गंदे हैं, बल्कि उनके प्यूरीफायर और चिलर टैंक भी मानकों के अनुरूप नहीं हैं। आरोप-प्रत्यारोप के इस माहौल में खाद्य सुरक्षा विभाग इन संयंत्रों की निगरानी तो दूर रहा, पानी के नियमित नमूने लेने में भी परहेज कर रहा है।
अफसरों की मानें तो खुला पानी सप्लाई करने वाले लाइसेंसिंग परिधि में नहीं आते और इसी कारण वहां सिर्फ सोर्स ऑफ वाटर की चेकिंग की जाती है। डीप बोर वेल की एक बार पुष्टि होने के बाद दोबारा निरीक्षण की जरूरत नहीं समझी जाती। जहां पानी की पैकेजिंग होती है, उन संयंत्रों से पेयजल के नमूने लखनऊ स्थित राज्य स्वास्थ्य संस्थान की लैब भेजकर पानी की केमिकल, वैक्टीरियल और रेडियोलॉजिकल जांच कराई जाती है, लेकिन यह प्रक्रिया भी पिछले एक साल से थमी है।



प्लांट वाले खुद कराते रहते हैं पानी की जांच
‘शहर के कितने वाटर प्लांट पानी की सप्लाई कर रहे हैं, इसका सही अनुमान नहीं है। प्लांट चलाने वाले लोग खुद समय-समय पर पानी की जांच कराते रहते हैं। इस सीजन में अभी तक पानी का कोई नमूना नहीं लिया गया है। नगरपालिका वालों ने लिया हो तो पता नहीं। फिलहाल, 21 मई तक खान-पान की वस्तुओं के नमूने लेने का अभियान चलेगा और इसके बाद ही वाटर प्लांट चेक किए जाएंगे।’
- मनोज कुमार तोमर, प्रभारी मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी

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