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यादगार रही बदरीनाथ-केदारनाथ की यात्रा

Shahjahanpur Updated Thu, 14 Jun 2012 12:00 PM IST
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मस्ती छुट्टियों की: कीर्ति, रिशू और हिमांशु ने सुनाया यात्रा का सुखद वृतांत
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- मन को बहुत भाए ग्लेशियर और अन्य प्राकृतिक दृश्य
- अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों का मिलन भी देखा
सिटी रिपोर्टर
शाहजहांपुर। गर्मी की छुट्टियों में एक पंथ दो काज करने के उद्देश्य से पौराणिक स्थलों की यात्रा का प्रोग्राम बन गया। हम लोग तीन जून को दून एक्सप्रेस से रात करीब नौ बजे हरिद्वार को रवाना हुए। कटियाटोला निवासी कीर्ति वर्मा, रिशू वर्मा और हिमांशु वर्मा ने अपनी रोमांचक यात्रा को विस्तार से सुनाया। कीर्ति फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर चुकी हैं, जबकि रिशू एसएस कॉलेज में बीकॉम तृतीय वर्ष और हिमांशु सेंट पाल्स में कक्षा आठ में अध्ययनरत हैं।
रिशू और कीर्ति ने बताया कि परिजनों के साथ हम सभी चार जून की सुबह हरिद्वार पहुंच गए, वहां गंगा स्नान करने के बाद थोड़ी-बहुत शॉपिंग की और रात को वहीं स्टे किया। पांच जून को सुबह किराए पर एक गाड़ी ली और ऊखीमठ जा पहुंचे। बताया जाता है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह हुआ था। ऐसी भी मान्यता है कि जब सर्दियों में केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद होते हैं तो भगवान यहीं विराजते हैं। इस कारण इस स्थान की महत्ता कुछ अलग ही है। यहां कुछ देर रुककर अगले पड़ाव सीतापुर के लिए निकल पड़े।
छह जून को हम लोगों ने गौरीकुंज में गाड़ी छोड़ दी और खच्चर से आगे की यात्रा शुरू की। यात्रा काफी दुर्लभ थी। डरते हुए जैसे-तैसे 14 किलोमीटर का सफर पूरा हुआ। बकौल कीर्ति: मंदिर में जब भैंसें के रूप में भगवान केदारनाथ को देशी घी लगाया तो ऐसा अहसास हुआ कि यह मूर्ति नहीं, बल्कि साक्षात भगवान का ही स्पर्श कर रहे हों। शरीर में सिहरन सी दौड़ गई। यहां के ग्लेशियर का नजारा दुर्लभ था। कुछ देर बाद शरीर में ऑक्सीजन की कमी सी महसूस होने लगी।
तभी वहां मौजूद एक अपरिचित महिला ने कपूर सुंघाकर स्थिति संभाली। यदि ऐसा नहीं होता तो बात बिगड़ भी सकती थी। उसी दिन शाम को सभी वापस सीतापुर आ गए।
सात जून को बदरीनाथ का कार्यक्रम था। सो हम लोग नाश्ता करके कार से बदरीनाथ जी के दर्शन को निकल पड़े। यह रास्ता केदारनाथ यात्रा के मुकाबले काफी सुगम था। जोशीमठ में रात्रि विश्राम किया। यहां की खास बात यह थी कि एक पर्र्वत हाथी के आकार का और एक पर्वत लेटी हुई महिला के आकार का था। बताया गया कि ऐसा किसी शाप के कारण हुआ। आठ जून को भगवान बदरीनाथ जी के दर्शन हुए। इसके बाद भारत के आखिरी गांव माड़ागांव पहुंचे। इसी गांव में व्यास जी और गणेश जी की गुफा भी देखी। जो काफी आकर्षक लगी।
पूरी यात्रा का रोमांच मनभावन प्राकृतिक दृश्यों के अलावा अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का बहाव में दिखा। मंदाकिनी जहां ग्रीन कलर की थीं और शांत मन से बह रही थीं, वहीं अलकनंदा भूरे रंग में उछलते-कूदते आगे बढ़ रही थी। 11 जून को सुबह करीब पांच बजे सभी वापस आ गए।

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