विनोबा आश्रम में भी नि:शब्द, रंगहीनदुनियां

Shahjahanpur Updated Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
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रोटी गोदाम स्कूल की भांति ही यहां भी नेत्रहीन- मूक-बधिर सीख रहे हैं ककहरा
- घर-परिवार से कोसों दूर इन बच्चों की है अपनी अलग भाषा
- 15 मई को स्कूल बंद होने के बाद घर लौट जाएंगे बच्चे
अजय अवस्थी
शाहजहांपुर। रोटी गोदाम स्कूल की ही तरह एक दुनियां बरतारा के विनोबा सेवा आश्रम में भी है। जहां नेत्रहीन और मूक-बधिर बच्चे सामान्य बच्चों से कुछ हटकर ककहरा सीख रहे हैं। घर-परिवार से कोसों दूर इन बच्चों की अपनी अलग भाषा है और ज्ञान अर्जित करने का सलीका भी। बच्चे आपस में इतने घुल-मिल गए हैं कि अब उन्हें बिछड़ने का गम भी सताने लगा है। माता-पिता और अन्य परिजनाें से मिलने की खुशी तो उन्हें है, लेकिन स्कूल छूटने का मलाल भी उनसे बातचीत में झलक रहा था। नेत्रहीन बच्चे अपने सहपाठियों की पहचान उनकी आवाज से या छूकर कर लेते हैं और फिर आपस में एक-दूसरे के सुख-दुख सुनते-सुनाते हैं। वहीं मूक-बधिर बच्चों की अपनी भाषा ही अलग है। कुछ हाथों के इशारे तो कुछ आंखों ही आंखों में मूक गपशप करते-करते पढ़ते भी हैं और खेलते भी। इन दिनों यही चंद साथियों की उनकी सीमित दुनियां हैं। 15 मई के आसपास स्कूल बंद हो जाने के बाद ये बच्चे अपने घर-गांव लौट जाएंगे।
इन भोले-भाले बच्चों में दो सगे भाई भी हैं, जो देख नहीं सकते। एक का नाम श्रवण कुमार तो दूजे का नाम पप्पू लाल है। दोनाें बच्चे बंडा क्षेत्र के बरीबरा निवासी बृजलाल मौर्य और लड़ैता देवी के पुत्र है। श्रवण चुलबुला अधिक है, जबकि पप्पू कुछ शांत स्वभाव का है। इसलिए श्रवण ने हर सवाल का जवाब अपने निराले अंदाज में दिया। बोला: वह पढ़-लिखकर ऐसा बनना चाहता है, जिससे जीवन-यापन आसानी से हो सके। उसका सपना शिक्षक बनने का है, ताकि वह अन्य बच्चों को शिक्षित कर सके। एक सवाल के जवाब में श्रवण ने कहा, मां-बाप से बड़ा कोई कैसे हो सकता है। आखिर उन्होंने ही तो पैदा किया है। उसकी नजर में माता-पिता के बाद गुरु का और उसके बाद भगवान का दर्जा आता है। श्रवण का कहना है कि तीर्थ स्थलों की यात्राएं करना तब तक व्यर्थ है, जब तक मां-बाप की सेवा न की जाए। दोनों बच्चों को समाचार, आल्हा और रामायण सुनने का शौक है।
इसी बीच ईश्वरवती की मां का फोन आ जाता है। इसके शिक्षक ने जैसे ही मोबाइल इस बच्ची को थमाया और बताया कि उसकी मम्मी बात करना चाहती है, तो वह खुशी से उछल पड़ी और मोबाइल हाथ में पकड़ते ही बोली: मम्मी नमस्ते। घर के अन्य सदस्यों का हालचाल उसने उसी ढंग से पूछा जैसे कोई जिम्मेदार व्यक्ति पूछता है। मां के बाद ईश्वरवती ने पापा और मौसी से भी बात की। फुरसत मिलते ही उसने बताया कि वह भावलखेड़ा के गांव जमालपुर निवासी लालाराम और रामबेटी की पुत्री है। वह दो भाई और दो बहनें है। ईश्वरवती भले ही उम्र में छोटी हो और रंग-बिरंगी दुनियां को देख नहीं सकती हो, लेकिन उसने भी कुछ सपने देखे हैं, जो रंगीन हैं। अपने सपनों को वह पढ़ाई पूरी करने के बाद पूरा करना चाहती है।
ओमपाल की दुनियां भी रंगहीन है, लेकिन उसे कोई मलाल नहीं है। बड़े भोले अंदाज में कहता है कि जैसा करम वैसा फल ईश्वर देता है। इस उम्र में करम खराब कैसे हो सकता है, के सवाल पर बोला: पता नहीं भगवान ने उसे कौन से करम का फल आंखों की रोशनी छीनकर दिया है। बोला: भगवान से मुलाकात हो तो उससे सबसे पहले ज्ञान मांगूंगा, फिर उससे पूछूंगा कि उसने ऐसा क्यों किया। अन्य बच्चों की तरह मुझे भी दुनियां देखने का मौका दो। आखिर उससे कौन सी गलती हुई, जो इतनी बड़ी सजा दी है। ओमपाल होरीलाल और किरन देवी का बेटा है।
इन बच्चों को इस बात का भी मलाल है कि शहर से दूर उन तक सहारा देने और खुशियां बांटने वाले हाथ नहीं पहुंच सके, जबकि रोटी गोदाम स्कूल में संचालित प्री-इंटीग्रेशन कैंप के बच्चों को सामाजिक संस्थाएं आए दिन दुलारती रहती हैं।

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