जहां देवी का सम्मान होगा, वहीं महालक्ष्मी

Sant kabir nagar Updated Sat, 03 Nov 2012 12:00 PM IST
संतकबीरनगर । जहां देवियाें का सम्मान होता है वहीं नारायण समेत महालक्ष्मी विराजती हैं, जहां नारी को अपमानित किया जाता है वहां सभी क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं। महाभारत की लड़ाई का मूल कारण सिर्फ दो है लालच और क्रोध। इसके चलते आज भी घर-घर में लड़ाई छिड़ी हुई है। वहीं राम ने अयोध्या का राज्य भरत के लिए और भरत ने राम के लिए त्यागकर भाई-भाई के बीच प्रेम भाव का आदर्श प्रस्तुत किया था। आत्मकल्याण और शांति चाहने वालों को इन दोनों बुराइयाें को त्याग देना चाहिए। यह विचार वृंदावन से आए अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के संत कथा व्यास देवकी नंदन ठाकुर जी ने शुक्रवार को जिला मुख्यालय के जूनियर हाईस्कूल में आयोजित भागवत कथा केदूसरे दिन व्यक्त किया।
कथा व्यास ने महात्मा शुकदेव की कथा सुनाते हुए कहा कि व्यास पुत्र शुकदेव बारह वर्ष तक मां के गर्भ में रह गए। उन्होंने जन्म लेना तब स्वीकार किया जब स्वयं प्रभु ने उन्हें मोह माया से परे होने का वरदान दिया। फिर तो जन्म लेने के बाद शुकदेव जी जंगल की ओर निकल गए और पिता पुत्र मोह में बेटा-बेटा कहते हुए पीछे-पीछे चले फिर उन्हें वापस आना पड़ा। वास्तव में मोह तो मैं और मेरे में हैं जब तक इसका त्याग नहीं होगा व्यक्ति सुखी नहीं होगा। भागवत महापुराण की महिमा बताते हुए कथा व्यास ठाकुर जी ने कहा कि द्वापर के अंत में कलियुग को प्रवेश करते देख स्वयं कृष्ण कलियुग के जीव के उद्धार के लिए चिंतित थे। तभी सर्वेश्वरी राधा आ पहुंचीं, उन्होंने हरिनाम और संत्सग का उपाय बताया। इसी तरह सत्रह पुराणों के रचयिता वेदव्यास को चैन नहीं मिला तो उन्हाेंने नारद जी से कहा किस उपाय से चित्त शांत होगा। भगवान का मन कहे जाने वाले नारद जी ने कहा श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना करो तभी चित्त की चंचलता जाएगी। भगवान का श्री विग्रह कहे जाने वाले इस महापुराण क ो कहनेे और सुनने से मन शांत होता है। प्राणी को वास्तविक आनंद की प्राप्ति होती है। कथा व्यास ने राजा परीक्षित के सामने कलियुग के आगमन, उसके रहने के स्थल और राजा परीक्षित के गृहत्याग की कथा सुनाई। महर्षि कपिल का आख्यान सुनाने के साथ कथा को विराम दिया। कथा व्यास ने कथा के पूर्व करवाचौथ के व्रत के बावजूद कथा सुनने आई महिलाआें को साधुवाद दिया। इस अवसर पर आयोजक उपेंद्र त्रिपाठी, राजलक्ष्मी, रामगोपाल रूंगटा, कुंज बिहारी रूंगटा, पवन छापड़िया, विवेकानंद वर्मा, अर्जुन पाठक, इंजीनियर राधेश्याम पांडेय समेत अन्य शामिल रहे।
इनसेट
चिंतन बिंदु
कथा व्यास ठाकुर जी ने कथा के बीच में सुमधुर भजनों के साथ ही सूत्र वाक्य कहे।
जब अंदर से बुराई निकल जाती है तब सत्संग में आनंद की अनुभूति होती है।
व्रत त्योहार इंसान को भगवान के करीब लाते हैं।
जो भगवान पर आस्था और विश्वास रखते हैं उनका मानसिक संतुलन सही रहता है।
बचपन से ही सत्संग की आदत डालनी चाहिए।
धर्म के कार्य में सहयोग करने से माता-पिता का कलेजा शीतल होता है।
जो भगवान से लौ लगाए प्रभु गुणगान में सहयोगी बने वह देवता और अच्छे कार्य में व्यवधान डाले वही राक्षस।
विश्व में शांति एटम बम बनाने से नहीं, सद्भाव कायम करने से होगी।

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