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अब नहीं रहे स्वतंत्रता सेनानी चंद्रबली यादव

Sant kabir nagar Updated Mon, 15 Oct 2012 12:00 PM IST
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मेंहदावल/संतकबीरनगर। मेंहदावल थाना क्षेत्र के नवदरी गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रबली यादव का रविवार को निधन हो गया। वह लगभग 103 वर्ष के थे। देश की आजादी की जंग लड़ने वाले चंद्रबली की मौत की खबर से क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
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जनपद के इकलौते जीवित रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रबली यादव पिछले एक महीने से अस्वस्थ चल रहे थे। रविवार की दोपहर में उनकी मौत हो गई। इनकी मौत की खबर पर समूचा क्षेत्र शोकाकुल हो उठा। उनके घर पर क्षेत्र के तमाम लोग पहुंच गए। तहसीलदार मेंहदावल इंद्रभान तिवारी भी मौके पर पहुंच गए और सेनानी के शव पर पुष्प अर्जित कर शोक संवेदना व्यक्तकिया। चंद्रबली यादव के भतीजे पन्ने लाल पुत्र प्रहलाद को तहसीलदार ने 5,000 रुपये अंत्येष्टि के लिए तत्काल उपलब्ध कराया। तहसीलदार ने कहा कि प्रशासन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय चंद्रबली यादव के परिवार को हर सुख-दुख में सहयोग करने के लिए तत्पर रहेगा। जिले के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रबली यादव बुढ़ापे में भी देश की आजादी के लिए लडे़ गए जंग की कहानी संस्मरण कर नवयुवक पीढ़ी को सुनाते रहते थे। सीधे स्वभाव व दिखावा से दूर रहने वाले चंद्रबली क्षेत्र के ग्रामीणों के चहेते थे। एसडीएम विनय श्रीवास्तव, बीडीओ दिग्विजय नाथ तिवारी, एसओ राकेश यादव आदि ने स्वतंत्रता सेनानी के निधन पर शोक व्यक्त किया। मृतक सेनानी के घर पर क्षेत्र के लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था। सभी सेनानी की मौत को एक इतिहास का अंत बताते और उनकी आंखों से आंसू छलक उठा। मृतक परिजन सदमे में थे।

तिरंगे को देखकर खुश हो जाते थे
मेंहदावल/संतकबीरनगर। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर आजादी की जंग में शामिल वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रबली यादव अब इतिहास बन चुके हैं। आजादी के पहले के समय और अब के बदलाव को महज सोच कर वे तड़प उठते थे।
मेंहदावल क्षेत्र के नवदरी गांव निवासी 103 वर्षीय चंद्रबली यादव वर्ष 1942 की लड़ाई में देश की आजादी के लिए जेल गए थे। पांच महीने तक जिला कारागार बस्ती में बंद रहे। संतान सुख से वंचित चंद्रबली की धर्मपत्नी 25 साल पूर्व स्वर्ग सिधार गईं थी। वह अपने भाई भतीजों के साथ रहते थे। अंतिम सांस तक वे देश के प्रति समर्पित रहे। चंद्रबली यादव की पढ़ाई लिखाई कम थी। बचपन से ही वह आंदोलनकारियों के साथ जुड़ गए थे। गांधी जी को अपना गुरु मानते थे। गांव में बीरबल कहे जाने वाले इस वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी ने हमेशा भारत माता के जयकारे के साथ ही सुबह की नींद तोड़ने की आदत डाल रखी थी। भारत छोड़ो आंदोलन में वे किसानोें के संगठन के माध्यम से उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई थी। अपनों का कुशलक्षेम लेने के साथ राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल होने से कभी पीछे नहीं रहे। उनके भतीजे पन्ने लाल ने बताया कि तिरंगा लहराता देख कर खुशी से झूम उठते थे।
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