भोले के जलाभिषेक को सजे शिवालय

Sant kabir nagar Updated Mon, 09 Jul 2012 12:00 PM IST
संतकबीरनगर। सावन महीने का पहला सोमवार काफी खास माना जाता है। शिवालयों में आज के दिन जलाभिषेक को भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। तामेश्वरनाथ मंदिर तो किसी मेले में तब्दील हो जाता है। लिहाजा, जिला प्रशासन ने जिले के सभी प्रमुख शिव मंदिरों की सुरक्षा व्यवस्था का विशेष इंतजाम किया है। जिससे भक्तों को कोई असुविधा न हो। तामेश्वरनाथ मंदिर में महिलाओं और पुरुषों के जलाभिषेक के लिए मंदिर की ओर से अलग-अलग इंतजाम किए गए हैं।
मुख्यालय स्थिति तामेश्वरनाथ मंदिर की काफी प्रसिद्धी रही है। यहां दूरदराज से भक्तों की भारी भीड़ एकत्र होती है। मंदिर व्यवस्थापकों ने भक्तों के जल भरने के लिए तालाबों को पूरी तरह से साफ करवा दिया है। साथ ही पोखरे को स्वच्छ जल से भर दिया गया है। परिक्रमा मार्ग, शिव पार्वती मंदिर और हनुमान मंदिर की भी सफाई करवा दी गई है। रविवार को सीओ अनिल कुमार और एसडीएम विनय कुमार सिंह ने मंदिर पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेते हुए पूरी व्यवस्था चुस्त दुरुस्त रखने का निर्देश दिया है। महिलाओं और पुरुषों के लिए तामेश्वरनाथ मंदिर पर अलग से बैरिकेटिंग कराई गई है। मान्यता के अनुसार सोमवार को बाबा भोलेनाथ अपने शिवालयों में प्रत्यक्ष रुप से प्रकट होते हैं। सोमवार के दिन इनकी भक्तों पर विशेष कृपा होती है। इसलिए भक्तजन शिव को अपने अपने स्तर से प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। कांवड़ियों का जल लेकर पहुंचने का क्रम शाम से ही शुरू हो गया। देर रात से ही भोले बाबा के दर्शन को तामेश्वरनाथ मंदिर में भक्त पंक्तिबद्घ हो गए।
अफसरों ने लिया बिड़हर घाट का जायजा
धनघटा। श्रावण मास के प्रथम सोमवार को जनपद के विभिन्न शिव मंदिरों पर जलाभिषेक के लिए पहुंचेंगे। इसी क्रम में धनघटा तहसील क्षेत्र में स्थित सरयू के तट बिड़हर घाट पर जल भरने के लिए पहुंच रहे हजारों कांवरियाें व श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने रविवार को एडीएम भोलानाथ मिश्र, एडिशनल एसपी कृपाशंकर सिंह, एसडीएम दीनानाथ उपाध्याय, तहसीलदार राजेश कुमार, एसओ धनघटा विजय शंकर शर्मा पहुंचे। अफसरों ने वहां घाट की व्यवस्था की जानकारी ली। तहसीलदार धनघटा ने बताया कि सुरक्षा व्यवस्था के तहत नाव और गोताखोर लगाए गए हैं। साथ ही लोग गहरे पानी में न जाएं उसके लिए बल्ली व रस्सी के सहारे बैरीकेडिंग की गई है।
हर-हर महादेव से गूंजा क्षेत्र
धनघटा। श्रावण मास के प्रथम सोमवार को शिव का जलाभिषेक करने के लिए रविवार को जनपद के विभिन्न गांवों से सरयू नदी के बिड़हर घाट पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। रविवार को मां सरयू के पावन जल में स्नान कर सोमवार को शिव लिंग पर चढ़ाने के लिए सरयू मैया का पावन जल कांवर में भरकर क्षेत्र में स्थित शिव लिंगों पर चढ़ाने के लिए कांवरियों का जत्था निकला। सूत्रों की माने तो सरयू के बिड़हर घाट से लगभग 15 हजार श्रद्धालु जल भर कर हर-हर महादेव के जयकारों के साथ निकलते रहे। जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय प्रतीत हो रहा है। जगह-जगह गेरूआ परिधान में सजे कांवरिया जत्था के लोग बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है... जयकारा लगाते हुए झुंड की शक्ल में चल रहे थे।

जनपद के कई शिव मंदिरों की है एतिहासिक और पौराणिक महत्ता
धनघटा। बाबा तामेश्वरनाथ धाम की अपनी एक अलग महत्ता है। महाभारत की पात्र कुंती ने अज्ञातवास के लिए जाते समय पांडवों के साथ तामेश्वरनाथ में भगवान शिव की पूजा की थी। इसके अलावा भगवान बुद्ध ने गया जाते समय यहीं अपना मुंडन संस्कार कराया था। इस स्थल की महत्ता को देखते हुए बांसी के राजा ने मंदिर की स्थापना कराई और तभी से यह स्थान लोगों के लिए आस्था का केन्द्र बन गया। बाबा तामेश्वरनाथ धाम की अपनी एक अलग महत्ता है।
मान्यता के अनुसार महाभारत काल में इसी शिवलिंग की पूजा पांडवों की माता कुंती ने की थी। अज्ञातवास के लिए जाते समय जिन 108 शिवलिंगों का उन्हाेंने जलाभिषेक किया, यह उनमें से एक है। महल त्याग कर सन्यास लेने निकले गौतम बुद्ध गया जा रहे थे तो तामेश्वरनाथ में रुककर अपना मुंडन कराया था। बाद में यह स्थान अदृश्य हो गया और शिवलिंग पर एक मिट्टी का टीला बन गया। आसपास के चरवाहे यहां अपनी गाय चराते थे। एक ग्वाले की गाय रोज यहीं अपना दूध गिराती थी। इसके बाद उत्सुकतावश लोगों ने टीले की खुदाई कराना चाहा तो तमाम संकट आते गए। चर्चा सुनकर खलीलाबाद के सुबेदार खलीलुर्रहमान ने टीले की खुदाई शुरू करवाई। दिन में जो खुदाई होती थी, वहां से भारी तादात में बिच्छू और सर्प निकलते थे। यही नहीं खुदाई की गई जमीन रात में स्वत: पट जाती थी।
इसके बाद मजदूर वहां से भाग आए। इस बात की जानकारी बांसी नरेश को हुई तो उन्होंने टीले वाले स्थान पर शिव जी का मंदिर स्थापित कराया और उसकी देखरेख के लिए गोरचापुर जिले के रसया निवासी घनश्याम, टेकधर और बुझावन बाबा को बुलवाया। घनश्याम दास कुछ दिन तक तामेश्वरनाथ में रहने के बाद बस्ती के पिरैला गांव में स्थित शिव मंदिर पर चले गए और वहां पूजा अर्चना करने लगे। जबकि बुझावन और टेकधर तामेश्वरनाथ मंदिर की देखभाल करते थे। तामेश्वरनाथ मंदिर के गोसाई बाबा विरेन्द्र भारती और अरुण ने बताया कि बाबा तामेश्वरनाथ मंदिर में जो भी श्रद्धालु श्रद्धा से आता है, उसके दु:ख दूर हो जाते हैं। यही वजह है कि यह मंदिर आसपास के जिलों के लोगों के लिए आस्था का केन्द्र बन चुका है। उन्होंने बताया कि यहां मुंडन, शादी, कीर्तन आदि कार्यक्रम समय पर हमेशा आयोजित होते हैं।

हैहेश्वरनाथ : हैंसर स्थित हैहेश्वरनाथ मंदिर के बारे में हैंसर वासियाें ने बताया कि मंदिर का निर्माण लगभग 400 वर्ष पूर्व हुआ था। ग्रामीण बताते हैं कि जनकपुर में सीता स्वयंवर में जाते हुए हैहय नरेश बाणासुर ने यहीं रात्रि विश्राम किया था। प्रात: काल इस स्थल पर मौजूद टीले पर उनके आग्रह पर यहीं शिवलिंग प्रकट हुआ था। तभी से यह मंदिर हैहेश्वरनाथ धाम के नाम से प्रसिद्ध हैं। हैहेश्वर नाम के एक वणिक ने यह मंदिर और बगल का तालाब खुदवाया था। उसी के नाम पर इस स्थल का नाम हैहेश्वरनाथ पड़ गया।

दानीनाथ : धनघटा स्थित दानीनाथ शिवमंदिर की बेहद मान्यता है। अति पुरातन इस मंदिर के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि अचानक धनघटा के घरों में लगने वाली आगजनी की घटनाओं से परेशान ग्रामीणाें ने एक विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर कारण पूछा। उसने बताया कि इसी स्थल पर भगवान शिव की जमीन में दबी पिन्डी है। गांव वालों ने खुदाई करा कर पिन्डी का दर्शन किया और तभी से यह स्थल सिद्ध माना जाने लगा। जनश्रुति यह भी है कि तब इस मंदिर से सटकर घाघरा की धारा बहती थी और उसी का जल यहां चढ़ा कर शिव अराधना होती थी।

कंकणेश्वरनाथ- पौली स्थित कंकणेश्वरनाथ मंदिर पर सीता विवाह के बाद अयोध्या वापस लौटते समय भगवान राम की बारात रुकी थी। अब से लगभग सवा सौ वर्ष पहले यहां कंकणेश्वरनाथ की स्थापना की गई। इस शिवलिंग की खासियत यह है कि यह कंकण से बना है। इसी लिए इसे कंकणेश्वर नाथ का नाम मिला है।

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