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दहेज मांगा तो दुल्हन से भी जाओगे

Saharanpur Updated Mon, 02 Jul 2012 12:00 PM IST
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सहारनपुर। कौन कहता है आसमान में सुराग नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। ये चंद लाइनें सहारनपुर की उन युवतियों पर सटीक बैठती है, जिन्होंने दहेज लोभी बारातियों को अपने दर से बिना दुल्हन ही लौटा दिया है। दहेज के प्रति बढ़ती इस नफरत को बुद्धिजीवी वर्ग समाज में बदलाव के अच्छे संकेत के रूप में देख रहे हैं। लोगों का मानना है कि आधुनिक युग की युवतियां शिक्षित और जागरूक हो रही हैं। उन्हें न तो दहेज लेना पसंद है और न ही देना। यह समाज की उस सबसे बड़ी कुरीति दहेज पर भी प्रहार है, जिसके चलते हर साल हजारों विवाहिताओं की बलि चढ़ा दी जाती है।
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नजीर एक : जालंधर की सुनयना और उसके परिजन यहां 28 जून को नुमाइश कैंप के वैभव से शादी करने आए थे। फेरों के बाद वर पक्ष ने कार की मांग उठाई, तो खुशी के रंग में भंग पड़ गई। मामला थाने पहुंचा, तो सुनयना शादी से ही इनकार कर दिया। सामान की अदला बदली पर मामला छूटा।
नजीर दो : हसनपुर की एक युवती की 24 जून को मुजफ्फरनगर से बारात आनी थी। हालांकि शादी से चार दिन पूर्व ही वर पक्ष की ओर से पांच लाख की मांग कर दी गई। परिजन मान भी गए, लेकिन युवती खुद सदर बाजार थाने पहुंच गई और दहेज लोभी ससुरालियों के विरुद्ध तहरीर दी। कहना था किसी भी सूरत में दहेज लोभी ससुरालियों के रिश्ता नहीं जोड़ना।

नजीर तीन : मंडी क्षेत्र के सिराज कालोनी की एक नजमा प्रवीण तो दुल्हन बनी बैठी रह गई थी। रामपुर मनिहारान क्षेत्र के इस्लामनगर के राशिद की बारात आनी थी, लेकिन वर पक्ष ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया था कि एक लाख रुपये दो तभी बारात आएगी। बाद में नजमा ने ऐसे युवक से शादी करने से ही साफ इंकार कर दिया था।

लड़कियों के विजन में आया बदलाव
जेवी जैन कालेज की प्रवक्ता डा. ज्योति सिंह मानती है कि अब लड़कियों के विजन में चेंज आ रहा है। पहले की अपेक्षा महिलाओं में शिक्षा और घर से बाहर निकल कर कार्य करने की सोच बढ़ी है। यही वजह है कि माता-पिता, पति, भाई पर डिपेंडे रहने की बजाय महिलाओं में आत्मनिर्भर हुई हैं। इसी से महिलाएं हार्ड डिसीजन लेने में खुद को सक्षम पाती हैं। सामाजिक कुरीतियों के प्रति यह बदलाव अच्छे संकेत है।

घर से चूल्हे तक सीमित नहीं रही महिलाएं
महिला अधिवक्ता सपना ठाकुर कहती हैं कि समाज में हर किसी को जीवन जीने का हक है। चाहे पुरुष हो या महिला। सही गलत के निर्णय लेने के लिए हर कोई स्वतंत्र है। महिलाओं में शिक्षा का स्तर ऊपर उठा है। अब वह घर का चूल्हा चौका ही नहीं करती, हवाई जहाज, ट्रेन से लेकर मल्टीनेशनल कंपनियों के संचालन तक में नारी शक्ति का लोहा मनवा रही है। सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूकता भी इसी सोच का नजरिया है कि वह अब दब कर जीने वालों में से नहीं रही।

दहेज नहीं अब तो स्टेट्स सिंबल कहिए
सहारनपुर। कहने को तो दहेज लेना और देना दोनों पाप है। अब दहेज की संज्ञा बदल गई है। शादियों में शाही अंदाज, चमक दमक और भारी भरकम कैश, ज्वैलरी, साजोसामान देने का अब दहेज नहीं कहा जाता। इसे स्टेट्स सिंबल कहा जाता है। हैरत की बात यह है कि समाज के जो लोग सभा, बैठकों, सार्वजनिक मंचों पर दहेज विरोधी नारे लगाते हैं, वहीं इसे स्टेट्स सिंबल बताने का दावा करते हैं।

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