इतिहास एवं संस्कृति जानने का माध्यम भाषा

Rampur Updated Sat, 03 Nov 2012 12:00 PM IST
रामपुर। प्रख्यात इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब ने कहा कि किसी भी देश का इतिहास ऐतिहासिक स्रोत के बिना नहीं लिखा जा सकता है। सिक्के, इमारत, टेराकोटा, पांडुलिपियां व प्राचीन साहित्य से हमें इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी मिलती है। प्राचीन ग्रंथों वेद, पुराण व स्मृति में भी इतिहास के बारे में जानकारी मौजूद है। साहित्य कई भाषाओं में मौजूद है। इसका अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए। ताकि सभी को जानकारी मिल सके।
प्रोफेसर हबीब शुक्रवार को रजा लाइब्रेरी में भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के स्रोत विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्राकृत पहली लिखित भाषा है, लेकिन इस भाषा के जानकार कम होते जा रही हैं। इसके अलावा ब्राह्मी लिपि के जानकार भी बहुत कम हैं। भाषा संबंधी जानकारी कम होने के कारण हम इतिहास एवं संस्कृति संबंधी पुख्ता जानकारी नहीं हासिल कर पा रहे हैं। इस जानकारी को हासिल करने को आवश्यक है कि प्राकृत, संस्कृत, अरबी, फारसी, तमिल के साथ अंग्रेजी के जानकारों की संख्या बढ़े। उन्होंने कहा कि स्थिति यह आज देश में प्राकृत के गिनेचुने जानकार बचे हैं। युवा पीढ़ी भी ऐसी भाषाओं की जानकारी हासिल करने के प्रति जागरूक नहीं है। वजह रोजगार के अवसर कम होना है।

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