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जिले के जांबाज सपूतों से थर्रा उठे थे चीनी सैनिक

Raebareli Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
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रायबरेली। भारत-चीनी भाई-भाई का नारा देने के बाद पीठ में खंजर से वार करने जैसा था चीन का हमला। इस हमले में भारतीय सेना ने चीनियों की गोलियों का करारा जवाब दिया था। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में रायबरेली की मिट्टी से जन्मे आठ वीर सपूतों की शहादत को भला कौन भुला सकता है। भारत-चीन युद्ध का जब भी जिक्र होगा, जिले के आठ जवानों का नाम खुद ब खुद लोगों की जुबां पर आ जाता है। दिल में दुश्मनों को सबक सिखाने के जज्बे ने सैनिकों को भूख-प्यास तक की फिक्र नहीं रही। उनके शरीर में जब तक सांस चली दुश्मनों से लड़ते रहे। दुश्मनों से घिरने के बाद भी हौसला नहीं टूटा। चीन की भारी भरकम सेना के आगे शेर की तरह कूद पड़े। उनके हाथ में भले ही अत्याधुनिक बंदूकें नहीं थीं, लेकिन जोश में कोई कमी नहीं रही। यही वजह रही कि शहीदों में गौरा मजरे अम्बारा मथई के शहीद कुक देवीशरण के साथ गुमानखेड़ा के बारबर उमाशंकर भी शामिल थे। बात जब देश की आन, बान और शान की रक्षा का आया तो बिना एक पल गवाएं ही दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए ये जवान बैरकों से निकल पड़े। उनकी भारी भरकम सेना पर काल की तरह सैनिक कूद पड़े। अंत में देश की रक्षा करते-करते शहीद हो गए। आज वे भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वीरगाथाओं से देशभर में जिले का सीना फख्र से चौड़ा है।
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