आधुनिकता की चकाचौंध में गुम होता गांधी का सपना

Raebareli Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
रायबरेली। गांव-गांव की यही पुकार, ग्रामोद्योग से है उद्धार। नहीं चाहिए शहर की गुलामी, हमें चाहिए स्वरोजगार। हर साल गांधी जयंती पर होठों पर यह गीत जरूर आता है, लेकिन हकीकत कहीं इससे जुदा है। आधुनिकता की चकाचौंध में महात्मा गांधी का सपना गुम होता जा रहा है। उद्योग लगाने के लिए लोग आवेदन तो करते हैं, लेकिन लंबी भागदौड़ के बावजूद उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही है। जिन्होंने उद्योग लगा लिया है, उन्हें तैयार की गई सामग्री बेचने में दिक्कत आ रही है। नतीजतन वह परेशान हैं।
जिले में खादी ग्रामोद्योग विभाग की स्थापना की गई है। इसके तहत लोगों को ऋण देकर उन्हें स्वरोजगार के लिए उद्योग लगाए जाते हैं। इसमें खनिज आधारित उद्योग, वनाधारित उद्योग, कृषि आधारित एवं खाद्य उद्योग, बहुलक और रसायन आधारित उद्योग, इंजीनियरिंग और गैर परंपरागत ऊर्जा, वस्त्रोद्योग, सेवा उद्योग शामिल हैं, जिनको लगाने के लिए ऋण की सुविधा दिलाने की व्यवस्था है। विभागीय अधिकारियों का दावा है कि वर्ष 2011-12 में 42 उद्योग लगाने का लक्ष्य था, जिसमें से 62 उद्योग लगाए गए थे। इसी तरह वर्ष 2012-13 में 60 उद्योग लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 30 उद्योग लगाने के लिए धन मुहैया हो गया है। विभागीय अधिकारी दावा चाहे जितना करें, लेकिन गरीबों को उद्योग लगाने के लिए लंबी भागदौड़ करनी पड़ती है। इसमें वही सफल हो पाता है, जिसकी या तो पहुंच होती है। अगरबत्ती, पत्थर से बनी हुई उपयोगी वस्तुएं, बर्तन धोने का पाउडर, चूड़ी निर्माण आदि के उद्योग लगवाने उद्योग संचालक परेशान हैं। ऐसा इसलिए कि मार्केट में पहले ही उनसे अच्छी वस्तुओं की बिक्री की जाती है, नतीजतन उनकी ओर से तैयारी की गई सामग्री को बेचने में दिक्कत आती है। वजह हर कोई फैशनेबल सामग्री खरीदने में रुचि दिखाता है।

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