जमाने ने तो मानवता की परिभाषा बदल डाली.....

Lucknow Bureauलखनऊ ब्यूरो Updated Tue, 27 Nov 2018 01:32 AM IST
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फालालगंज (रायबरेली)। बैसवारा शोध संस्थान की ओर से आयोजित अखिल भारतीय नवगीत सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार की रात कवि सम्मेलन हुआ। सौरभ शुक्ल ने अपनी रचना पढ़ी ‘जो चीखा रात में था वो अभी जिंदा खिलौना था, है आया सामने हवसी का वो चेहरा घिनौना था। जमाने ने तो मानवता की परिभाषा बदल डाली, उन्हें भी नोंच कर खाया जिन्हें गोदों में होना था।’
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रामनारायण रमण ने कहा ‘अंधेरे में खड़ा है जो उसे दीपक दिखाये जो, रसातल में गड़ा है जो उसे भी ला उठाये जो। वही है आदमी भी, देवता भी और ईश्वर भी, जमाने से लड़ा है जो जमाने को बचाये जो।’ बलदेव सिंह सागर ने सुनाया ‘किसके कंधों पर किसकी अर्थी होगी, माया, जीव, जगत का एक बहाना है। अनजानी गलियों का राही हूं यारों, अपनी बस्ती छोड़ मुझे फिर जाना है।’
कवि डॉ. शैलेंद्र प्रताप सिंह ने पढ़ा ‘अब नौजवान लड़के किस राह चल रहे हैं, पतवार न चलाकर कश्ती बदल रहे हैं। ‘बदले अगर खयाल तो मन यदि जरा बदले, पर आजकल के लोग कपड़े बदल रहे हैं।’ वरिष्ठ कवि रामबाबू रस्तोगी ने दोहे सुनाए ‘किसे सुनाएं चांदनी अपने मन की पीर, सब दुसासन हो गए राजा और वजीर।’
इनके अलावा चंद्रप्रकाश पांडेय, ओमशंकर झा, मयंक मिश्रा, राहुल शुक्ला, राजकरन सिंह, अंजनी कुमार सिंह, नरेंद्र, डॉ. यशोधरा राठौर, विनय भदौरिया, योगेंद्र प्रताप सिंह, सत्यप्रकाश त्रिवेदी और रविशंकर मिश्र आदि कवियों ने भी काव्य पाठ किया।

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