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प्रसव के बाद एक बेड पर दो-दो महिलाएं

अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़ Updated Mon, 25 Jul 2016 12:26 AM IST
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jila mahila hospital
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जिला महिला अस्पताल में प्रसव के लिए आने वाली गर्भवती महिलाओं का बुरा हाल है। एक बेड पर दो-दो महिलाओं को लेटाया जा रहा है। उनकी ठीक से देखभाल भी करने वाला कोई नहीं है। जनरल और सर्जिकल वार्ड के हालात बेहद खराब हैं। वार्ड में लगे पंखे मात्र रेंग भर रहे हैं। ऐसे में गर्मी और उमस से प्रसूताओं के साथ नवजात भी तड़प रहे हैं। ज्यादातर लोग तो पंखा झल कर राहत पाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो घर से टेबल फैन उठाकर ले आए हैं।
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पांच डॉक्टरों के भरोसे महिला अस्पताल
जिला महिला अस्पताल में सीएमएस डा.शुलभा पाठक के अलावा चार और डाक्टरों की तैनाती है। इसके अलावा दो डाक्टर संविदा पर भी रखी गई हैं। इनमें से दो डाक्टर ट्रेनिंग पर चली गई हैं। चार डाक्टरों में से एक-एक की बारी-बारी से ड्यूटी लगाई जाती है। स्टाफ नर्स भी मात्र तेरह ही हैं। डाक्टरों और नर्सों की कमी के कारण भी लोगों को समय पर राहत नहीं मिल पा रही है।
लेबर रूम में तीन, इमरजेंसी में मात्र छह बेड
जिला महिला अस्पताल के लेबर रूम में मात्र तीन बेड हैं। जबकि इमरजेंसी रूम में सिर्फ छह बेड हैं। प्रसव पीड़ा से कराह रही महिलाओं को पहले इमरजेंसी रूम में ही ले जाया जाता है। लेबर रूम में बेड खाली होने के बाद उन्हें प्रसव के लिए ले जाया जाता है। ऐसे में दर्द से उनका बुरा हाल हो जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि इमरजेंसी रूम फुल होने पर प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं को बाहर रैन बसेरा में बैठा दिया जाता है। अगर परिजन हल्ला मचाते हैं तो डाक्टर तुरंत इलाहाबाद के लिए रेफर कर देती हैं। जनरल वार्ड में भी मात्र दस बेड हैं जबकि प्रतिदिन 35 से 40 महिलाओं को प्रसव के लिए भर्ती कराया जाता है। ऐसे में मजबूरन उन्हें जमीन पर लेटना पड़ता है।
टूटकर गिर रही एसएनसीयू वार्ड की छत
जिला महिला अस्पताल में तीसरे तल पर बने एसएनसीयू वार्ड में गंभीर नवजातों को रखा जाता है। वार्ड के एक कक्ष की छत टूटकर गिर रही है। बगल में लगा एसी भी खराब पड़ा है। वार्ड में घुसने के संकरे रास्ते में बिजली के बोर्ड को खुला छोड़ दिया गया है। ऐसे में कभी भी बड़ा हादसा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।  
तड़प रहीं प्रसूताएं, आराम फरमा रहीं नर्स और दाइयां
महिला अस्पताल के वार्डों में जच्चा-बच्चा भले ही परेशान हों, लेकिन अस्पताल में तैनात नर्सों और दाइयों पर इसका कोई असर नहीं है। मरीजों की सेवा तो दूर की बात वो किसी से सीधे मुंह बात भी करना पसंद नहीं करतीं। रविवार को अस्पताल के वार्डों में मरीज जहां परेशान थे वहीं नर्स ड्यूटी रूम में एक दाई आराम से सो रही थी। उसके बगल एक नर्स भी आराम फरमा रही थी। उन्हें देखने और मनमानी पर रोक लगाने वाला कोई नहीं है।
48 घंटे रोकने का आदेश, 12-24 घंटे में ही डिस्चार्ज
शासन का आदेश है कि बच्चा होने के बाद प्रसूताओं को कम से 48 घंटे तक अस्पताल में रोका जाए और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाए। जिला महिला अस्पताल इसका ठीक उल्टा हो रहा है। सामान्य प्रसव होने पर जच्चा-बच्चा को 12 से 24 घंटे के बाद ही डिस्चार्ज कर दिया जा रहा है। डाक्टर इसके पीछे मरीजों की अधिक संख्या को कारण बताती हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर डिस्चार्ज किए गए जच्चा-बच्चा की हालत बिगड़ गई तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा।
चौतरफा गंदगी, किसी को सफाई की फिक्र नहीं
जिला महिला अस्पताल में चौतरफा गंदगी का अंबार लगा हुआ है। जगह-जगह अस्पताल का कचरा पड़ा हुआ है। मरीज और उनके तीमारदार वार्डों के बाहर और परिसर में बचा खाना फेंक दिए हैं जो सड़ रहा है। इससे उठने वाली दुर्गंध के कारण लोगों का बुरा हाल है। ओपीडी के सामने पानी की पीक से दीवारें रंगी हुई हैं।
गिट्टी गिराकर बंद कर दिया अस्पताल का मेन रास्ता
जिला महिला अस्पताल में कुछ दिनों पहले निर्माण कार्य चल रहा था। इसके  चलते अस्पताल के मेन रास्ते पर गिट्टी गिरा दी गई। अभी भी वहां गिट्टी का ढेर लगा हुआ है। इससे लोगों को अस्पताल आने-जाने में परेशानी हो रही है। लोग अक्सर गिरकर चोटहिल हो जा रहे हैं।
 
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