अंजू की चिता में झुलसीं ‘मुफ्त इलाज’ की योजना

Pratapgarh Updated Wed, 27 Nov 2013 05:40 AM IST
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शिवगढ़। बीमारी से लोगों को मौत बचाने के लिए किए गए सारे इंतजाम जिले में ध्वस्त हैं। गरीबों को मुफ्त इलाज के लिए तमाम योजनाएं हैं। यह योजनाएं बेटी संग स्तन कैंसर से ऊब कर जान देने वाली अंजू की चिता की आग में झुलस गईं। गांव से लेकर जिले स्तर के नेता व समाजसेवियों की भी उस पर नजर नहीं पड़ी।
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पट्टी कोतवाली के मकरा मनभावन गांव निवासी गुलाब बड़े शहरों में टैक्सी चला कर परिवार का भरण पोषण करता है। पिता शोभनाथ गुप्ता गांव में फेरी लगा नमक बेंचता है। गुलाब की पत्नी अंजू (28) स्तन कैंसर से पीड़ित थी। गरीबी से जूझ रहा उसका पति नागपुर, सूरत व जिले में भी इलाज करा कर थक चुका था। बेहद गरीब परिवार की मदद को कोई समाजसेवी या नेता सामने नहीं आया। गरीबी के बीच कैंसर पीड़ित अंजू ने 3 साल की पुत्री कविता के साथ सोमवार को आत्मदाह कर लिया। उनकी मौत से सरकार की मुफ्त इलाज वाली तमाम योजनाओं पर सवाल खड़ा हो गया है। मंगलवार को हर जगह एक बात सुनाई पड़ी, कि यदि प्रशासनिक मदद मिल गई होती तो मां-बेटी जिंदा होतीं। उसका पति गुलाब खुद इस बात को मानता है कि यदि पत्नी का इलाज हो गया होता तो वह उसे छोड़ कर न जाती। पत्नी की मौत में गुलाब ही नहीं उसके दो बेटे भी सदमे की स्थिति में हैं।
कैंसर हो या अन्य बीमारी, यदि कोई गरीब है और इलाज नहीं करा पा रहा तो उसकी मदद प्रशासन कर सकता है। बीमारी की पुष्टि के बाद पीड़ित या उसके परिजन को डीएम से मदद मांगनी पड़ती है। डीएम उसकी फाइल सीएमओ को भेज देते हैं। सीएमओ रिपोर्ट लगा कर फिर दस्तावेज डीएम को भेजते हैं। डीएम उस फाइल को कमिश्नर के पास पहुंचाते हैं। उसके बाद राहतकोष से इलाज के लिए लाखों रुपए मिल सकते हैं। अफसोस की अंजू को यह सहायता नहीं मिली।
मंगरौरा क्षेत्र का रामकिशोर का परिवार भी बेहद गरीब है। पिछले साल वह कैंसर से पीड़ित हो गया। इलाज करा पाने में नाकाम रामकिशोर की पत्नी ने मदद के लिए अधिकारियों से गुहार लगाई। काफी संघर्ष और भाग दौड़ करना पड़ा, लेकिन उसकी लगन व मेहनत रंग लाई। सीएमओ दफ्तर के कर्मी बताते हैं कि आपातकालीन राहत कोष से उसे इलाज के लिए करीब 5 लाख रुपए मिले। हालांकि इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया था।
रखहा (ब्यूरो)। अंजू का मायका दीवानगंज में है। पिता छोटेलाल गुप्ता व मां अमरावती देवी पुत्री की मौत से गमजदा हैं। कहते हैं कि उनकी बेटी बीमारी से ऊब चुकी थी। दामाद ने इलाज का पूरा प्रयास किया। उसने बिना कुछ कहे बेटी संग खुद को आग लगा कर जान दे दी।
स्वास्थ्य विभाग के जानकार कहते हैं कि गांव में तैनात आशा व एएनएम उसकी मदद कर सकती थीं। उन्हें चाहिए था कि उसकी गरीबी और बीमारी की सूचना सीएचसी अधिकारियों को देतीं। वे न सुनते तो सीएमओ को बतातीं, डीएम को अवगत करातीं। उनके प्रयास से आपातकालीन राहत कोष से उसके इलाज में प्रशासन से मदद मिल जाती।
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