कुम्हारों की चाक पर फैशन का चाबुक

Pratapgarh Updated Thu, 24 Oct 2013 05:38 AM IST
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‘मेरे बाद इस कला की हिफाज़त करेगा कौन, लकदक बजारों ने छीन ली खुशियां मेरे जहां की। मुफलिस हैं हम, मिट्टी की कीमत भी सोना हो गई। हम लाख चलाएं चाक चाहत पुरानी खो गई।’ कुम्हारी कला पर आधुनिक बाजारों का बढ़ा दखल प्रजापति समाज के लिए चिंता का विषय बन गया है। हर वर्ष की तरह इस बार भी दिवाली पर्व आते ही उनके दिल को कचोटती चिंता पर उक्त पंक्तियां सटीक बैठ रही हैं। इस वर्ग के लोग पैतृक व्यवसाय से दो वक्त चूल्हा तक जलाने में असमर्थ हो चुके हैं।
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कुम्हारों का पुश्तैनी धंधा महंगाई की आग में जल रहा है। लागत बढ़ने और मुनाफा घटने से उनका मन अब इसमें नहीं लग रहा। इसके बावजूद कुम्हारों के चाक दीपावली पर्व को देखते हुए तेजी से घूम रहे हैं। सदर बाजार में भुलियापुर कोहरौटी है। यहां के विनोद प्रजापति, शिवदास, भगौती प्रसाद, छेदी लाल, रामदुलार, रामसुमेर पंकज आदि कहते हैं कि अब इस काम में वह बात नहीं रही। लागत के मुताबिक मुनाफा नहीं हो रहा। करीब 10 साल पहले महज दीपावली पर्व पर साल भर का अनाज व खर्च निकल जाता था। वह बताते हैं कि कुम्हारी कला के सिमटने का कारण आधुनिक बाजार है। शहर से करीब चार किलोमीटर दूर बरनपुर निवासी रामसमुझ प्रजापति व मखदूम प्रजापति भी पुश्तैनी कारोबार का हश्र देख चिंतित हैं। कहते हैं कि हम लोगों का पूरा परिवार कड़ी मेहनत के बाद दियाली, बच्चों के लिए जतोला, गुल्लक, गणेश लक्ष्मी तैयार करते हैं। मिट्टी से लेकर कंडा व रंग तक मोल खरीदना पड़ता है। जितनी लागत लगती है उतना मुनाफा नहीं है। युवाओं को यह काम रास नहीं आ रहा। वे पैसा कमाने के लिए बाहर जा रहे हैं। पुरानी पीढ़ी के बाद चाक चलाने वाला मुश्किल से मिलेगा। कहते हैं कि लोगों का रुझान मोमबत्ती, विद्युत झालर, व चीनी मिट्टी और लकड़ी के सामान की ओर ज्यादा बढ़ रहा है।
दीपावली पर्व पर कुम्हार पूंजी डूबने की आशंका से भी ग्रसित हैं। प्रजापति समाज के वयोवृद्ध कहते हैं कि आज से करीब तीन चार साल पहले प्रति ट्राली मिट्टी 500 से 600 रुपए में मिल जाती थी। कंडा भी इतना महंगा नहीं था। इस वर्ष के बारे में बताया कि उन्हें एक ट्राली मिट्टी की कीमत 1000 से 1200 रुपए तक देना पड़ा। कंडा सहित अन्य सामान पर व्यय धन अलग है। कहते हैं कि एक ट्राली मिट्टी से बने बर्तन, पकाने, रंगाई और उसे बेंचने तक में करीब 13 से 14 हजार रुपए की लागत आती है। आंवा लगाने और पकाने में आदमी कम होने की वजह से मजदूरी पर रखना पड़ता है। एक आंवा का बर्तन पकने में बीस से पचीस दिन लगते हैं। बर्तन पकने तक मजदूर के साथ खुद भी खटना पड़ता है।
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