बिखर गए सपने, टूट गई आस

Pratapgarh Updated Sat, 26 Jan 2013 05:30 AM IST
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प्रतापगढ़। भारत की आजादी के लिए घर, परिवार और खुशियां छोड़कर दर-दर भटकने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देश की वर्तमान दशा से बहुत दुखी हैं। पहले गणतंत्र दिवस को याद कर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। उनका कहना है कि आजादी के पहले जो सपने देखे थे वे बिखर गए। 63 साल पहले जब देश में गणतंत्र लागू हुआ तो लगा अब अपना शासन है। जनता को न्याय मिलेगा। किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। न कोई राजा होगा और न प्रजा। हर ओर खुशहाली बिखरेगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अन्याय, भ्रष्टाचार, अत्याचार का बोलबाला है। ईमानदार और अच्छे लोग हाशिए पर पड़े हैं। मानों वे समाज का हिस्सा ही नहीं हैं। जनता खुद ऐसे लोगों को ‘अछूत’ मानने लगी है। उसका भी भरोसा सपने दिखाने वालों पर कुछ ज्यादा हो गया है। देश के लिए यह बहुत ही खतरनाक संकेत हैं।
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रानीगंज तहसील के औवार गांव निवासी नब्बे वर्षीय सुरेंद्र बहादुर सिंह ने पहले गणतंत्र को याद करते हुए कहा कि देश में संविधान लागू होने की बात सुनकर तब लोग झूम उठे थे। शहर से गांव तक जश्न मना था। देश में अपने कानून का राज चलने की खबर मात्र से लोग उत्साहित थे। उमंग और उत्साह के साथ लोग 26 जनवरी 1950 को सरकारी पाठशालाओं में एकत्रित हुए। वक्ताओं का भाषण सुना। देश की तरक्की और खुशहाली की जो उम्मीद थी, वह दिल में ही रह गई। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद सेना के नायक रहे सुरेंद्र सिंह को देश के गण पर भरोसा है मगर तंत्र पर नहीं। उन्होंने कहा कि आज किसी को गणतंत्र की महत्ता के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं है। इससे जनता को उसका हक नहीं मिल पा रहा है और देश का विकास अवरुद्ध हो गया है।

लालगंज क्षेत्र के देउमपूरब गांव निवासी राजाराम किसान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं। वह रामपुर खास से विधायक भी रह चुके हैं। अभी इसी माह विधान मंडल के उत्तरशती रजत जयंती समारोह में प्रदेश सरकार ने उनको सम्मानित भी किया है। अमर उजाला ने गणतंत्र दिवस के बारे में उनके भी विचार जाने। उन्होंने कहाकि तिरसठ साल पहले पहली बार 26 जनवरी 1950 को जब तिरंगा फहरा तो आंखें छलछला आईं। लगा कि अब अपना कानून, अपना देश और अपने लोग होंगे। ऐसा लग रहा था कि देशवासियों के दुर्दिन खत्म हो गए। न तो अब कोई राजा होगा न ही प्रजा। राजा होगी तो जनता। हुकूमत भी उसी की होगी। हम अपने देश को वह सब कुछ दे सकते हैं, जो ब्रिटिश शासन में नहीं मिला। न तो बेकारी होगी, न भ्रष्टाचार होगा और न हम कमजोर हाेंगे। मगर उम्मीदों पर पानी फिर गया। सपने भी नहीं सोचा था कि नेता भ्रष्ट होंगे। कर्मचारी और अधिकारी भ्रष्टाचार में डूबे रहेंगे। यह सुनकर दुख होता है कि जनता पर शासन करने वाले लोग जुर्म के पायदान पर चढ़कर संसद और विधान सभा में पहुंच रहे हैं। लगता है ईमानदारी और नैतिकता पूरी तरह से खत्म हो गई है। लोग ईमानदारी से ड्यूटी नहीं कर रहे हैं। जनता को धोखा देना जैसे पेशा हो गया है।
देश की आजादी के लिए शिवगढ़ विकास खंड के छीटपुर गांव के 95 वर्षीय मातापलट पांडेय के भीतर आज भी देश की सेवा का जज्बा बुलंद है। उन्होंने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर अपना अधिकार मिलने की खुशी में लोगों को खुशी में झूमते देखा था। हालांकि आज वह हक केवल सपना भर रह गया है। शहीदों की कुर्बानी भुला दी जा रही है। ब्रिटिशकालीन शासन में नेवी में भर्ती हुए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार बल्लभ भाई पटेल के आह्वान पर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के लिए आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इस दौरान नसीराबाद, अजमेर, नैनी जेल में कई साल व्यतीत किए। पुत्र के वियोग में उनकी माता आंख की रोशनी भी गंवा बैठीं। कहा कि पहले नेता देश सेवा की भावना से कार्य करते रहे किन्तु आज नेताओं में देश सेवा का जज्बा नहीं रह गया है। जनता को धोखा देने वाले लोग यदि अभी अपनी सोच में बदलाव लाएं तो देश सोने की चिड़िया फिर से बन सकता है।

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