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साहित्यिक पुस्तकों की कमी से सिसक रहा पुस्तकालय

Pratapgarh Updated Thu, 27 Dec 2012 05:30 AM IST
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प्रतापगढ़। बेल्हा में साहित्यकारों की कमी नहीं है। यहां के कवियों ने देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी रचनाओं से धाक जमाई है। यही नहीं साहित्य के कद्रदान भी यहां कम नहीं हैं। साहित्यिक गोष्ठियों, कवि सम्मेलन, मुशायरों पर नजर डाली जाए तो हर हफ्ते एक साहित्यिक कार्यक्रम होता है। बावजूद इसके शहर के राजकीय पुस्तकालय की हालत कुछ ठीक नहीं है। वहां साहित्यिक पुस्तकों का पूरी तरह से टोटा है। स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा भी समाज को साहित्य की संजीवनी उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
किसी भी शहर को विकसित करने में वहां रहने वाले लोगों की अहम भूमिका होती है। इस भावना को प्रेरित करने के लिए अध्ययन की जरूरत होती है। स्वाध्याय से लोगों की बुद्धि विवेक में इजाफा तो होता ही है तमाम जानकारियां भी उन्हें होती हैं। इसके लिए मजबूत और स्वस्थ पुस्तकालयों की जरूरत पड़ती है जो नई और पुरानी पीढ़ी का मार्गदर्शन करती हैं। बेल्हा में पुस्तकालय तो है लेकिन इसमें रखा साहित्य कमजोर है। जिस साहित्य की जरूरत बेल्हावासियों को है उसकी पूर्ति पुस्तकालय के माध्यम से नहीं हो पा रही है। इसके चलते मौजूदा समय में महज 150 सदस्य हैं। नई और चर्चित पुस्तकें तो यहां मिलती ही नहीं। साहित्यिक पुस्तकों की खरीद यहां के लोगों को ध्यान में रखकर नहीं की जाती। दिल्ली के पुस्तक मेले में पूरे प्रदेश के लिए पुस्तकों की खरीद कर ली जाती है। इसके चलते न तो इस पुस्तकालय में सदस्यों की संख्या में इजाफा हो रहा है और न ही साहित्य में।
राजकीय पुस्तकालय में किताबों के चयन के लिए बनी समिति भी इसमें रुचि नहीं ले रही है। साहित्य के लिए दावे तो तमाम किए जाते हैं लेकिन कोई प्रयास नहीं किया जाता। समिति में डीएम के साथ ही जिला विद्यालय निरीक्षक भी शामिल हैं। बावजूद इसके इस पुस्तकालय की दशा में परिवर्तन नहीं आ रहा है। बेल्हा के छात्रों को भी इस पुस्तकालय से कोई लाभ नहीं मिलता। चर्चित पुस्तकों को पढ़ने की उनकी इच्छा मन में ही दबी रह जाती है। बेल्हा में लोगों को साहित्य की संजीवनी से दूर ही रहना पड़ रहा है। समिति की बैठक भी काफी समय से नहीं हो सकी है।
जिले में अच्छे साहित्य को लोगों तक पहुंचाने का दावा करने वाली स्वयं सेवी संस्थाएं भी इसमें नाकाम हैं। ग्रामीणों को साहित्य पढ़ाने का दावा करने में तो वे आगे रहती हैं लेकिन लोगों तक किताबें पहुंच नहीं पातीं। हर साल उनकी डिमांड जिले के राजकीय पुस्तकालय में पहुंच जाती है। बावजूद इसके जमीनी हकीकत में किताबें किसी को भी उपलब्ध नहीं कराई जातीं बल्कि यह कहा जाए कि लोगों को इस तरह के पुस्तकालय के बारे में पता ही नहीं है तो ज्यादा ठीक होगा।
पुस्तकालयाध्यक्ष अनुराग पांडेय का कहना है कि चयन समिति द्वारा डिमांड भेजने के बाद भी उस पर ध्यान नहीं दिया जाता। पुस्तकों की खेप ऊपर के लोग अपने मन से ही भेजते हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं की पुस्तकों के लिए यहां से सिर्फ डिमांड भेजवा दी जाती है।

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