कसाब को फांसी से लालजी को मिला इंसाफ

Pratapgarh Updated Thu, 22 Nov 2012 12:00 PM IST
प्रतापगढ़। 26 नवंबर 2008 की रात का नजारा लालजी पांडेय और उनका परिवार कभी नहीं भूल पाएंगे। प्रतापगढ़ के घोरहा निवासी लालजी उस समय बेटे और बहू के साथ मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल स्टेशन पर बैठे थे। उन्हें घर आना था और ट्रेन में वक्त था। अचानक हमले से स्टेशन पर भगदड़ मच गई। बेटे और बहू थोड़ी देर को पानी पीने चले गए थे। उसी दौरान तड़ातड़ गोलियां चलने लगीं। लालजी ने आतंकी कसाब को बेहद करीब से देखा। लालजी को भी गोलियां लगीं। सब अस्त व्यस्त हो गया। भगदड़ में बेटे, बहू जाने कहां चले गए। किसी ने लालजी को अस्पताल पहुंचाया। कसाब की गोलियों से मिले जख्म लालजी के शरीर में अभी भी ताजा हैं। उसे फांसी पर लटकते हुए देखने को वह बेताब थे। उनकी यह मंशा पूरी होने में चार साल का वक्त लग गया। कसाब के फांसी पर लटकने की सूचना से परिवार के लोग बेहद खुश हैं।
कसाब ने स्टेशन पर जो आतंक मचाया, जिस बेदर्दी से लोगों की हत्या की वह सब लालजी के सामने हुआ। घटना में वह इस कदर घायल हो गए थे कि परिवार वाले उनकी जान को लेकर भी चिंतित हो गए थे। खूनी खेल और भगदड़ के बाद बेटे शैलेश और बहू किरन ने उन्हें बहुत तलाशा। सब तितर बितर हो गया था। कुछ भी अपनी जगह पर सुरक्षित नहीं बचा था। लालजी का कहीं पता नहीं चल सका। लाशों के ढेर में उनके शव की तलाश हुई लेकिन कुछ पता नहीं चल सका। दूसरे दिन चेंबूर के अस्पताल में किसी ने उनकी पहचान की और घरवालों को सूचित किया। लालजी के हाथ में गोलियां लगी थीं। चेंबूर के अस्पताल में लगातार चौदह घंटे उनका आपरेशन हुआ। हाथ की नसें नष्ट हो चुकी थीं इसलिए उसे ठीक नहीं किया जा सका। लालजी और घरवालों ने कहा कि जब-जब कसाब का चेहरा सामने आया, उसके लिए मौत ही मांगी।
हाथ को लेकर थोड़े दुखी लालजी का कहना है कि जब भी अपना हाथ देखा, आंखों में मुंबई रेलवे स्टेशन का दृश्य तैर जाता। लालजी का परिवार भी इस हादसे के बाद कसाब के लिए फांसी की दुआ कर रहा था। हाथ ठीक न होने के कारण लालजी ने मुंबई छोड़ दी लेकिन कसाब को लेकर हुए हर फैसले पर उनकी नजर होती थी। बुधवार सुबह वह अपने काम में लगे थे कि अचानक किसी ने उन्हें कसाब को फांसी होने की खबर दी। वह खुशी से उछल पड़े और घर पहुंचकर अपने परिवार वालों को जानकारी दी। फिर सभी साथ बैठ टीवी पर समाचार सुनने लगे। फांसी की पुष्टि होने पर उन्हें इत्मीनान हुआ। आतंकी को फांसी लगने से खुश परिवार के लोगों ने लोगों को मिठाइयां बांटी।
मुंबई हमले में जिंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब की पहचान करने के लिए घायल लालजी को भी कोर्ट में बुलाया गया था। उसे देखते ही लालजी की आखों में पूरा दृश्य तैर गया जब कसाब एके 47 से गोलियां बरसा रहा था। लालजी ने बताया कि कसाब घटना के समय उनके बेहद करीब था। लालजी ने अन्य घायलों के साथ कोर्ट में कसाब की पहचान की। उसे देखते ही उनके जेहन में पूरी घटना कौंध गई। वह हमलावरों में सबसे आगे था। जिधर एके 47 धुमा देता, लाशें बिछ जातीं। कई बार उसके नाबालिग होने की बातों ने लालजी को व्यथित किया कि कहीं वह बच न जाय लेकिन आखिरकार मृतकों और घायलों के साथ पूरा इंसाफ हुआ।

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