कंपनियों के सिंडीकेट से लग रही चपत

Pratapgarh Updated Sun, 11 Nov 2012 12:00 PM IST
प्रतापगढ़। आंवला उत्पाद बनाने वाली कंपनियों ने किसानों की मेहनत पर पानी फेरने का काम किया है। कंपनियों ने एक दूसरे से टाइअप करके किसानों के आंवला का मूल्य निर्धारण ही कम किया है। मनमाने रेट पर आंवला खरीद कर इन कंपनियों ने किसानों को चपत लगाई। इसमें बिचौलियों ने भी जिले के किसानों को निशाना बनाया।
देश में आंवला के चार बड़े खरीदार हैं। इनमें डाबर, झंडु, हरनारायण गोकुलचंद और स्वामी रामदेव । इन सबने पहले तो किसानों से संपर्क कर खरीदारी शुरू की। इनके संपर्क में आने से किसानों का उत्साह बढ़ा और उन्होंने इसकी उपज भी बढ़ाई। बाग बढ़ाए और इसके प्रति अन्य लोगों को भी जोड़ने की कवायद की। इसमें बड़ी कंपनियों की दिलचस्पी देख बिचौलिए भी इस धंधे में कूद पड़े उन्होंने कंपनियों के प्रतिनिधियों को लालच देकर किसानों से कम पैसे में ही आंवला देने का वादा कर लिया। बिचौलियों के माध्यम से अन्य कंपनियों ने भी एक दूसरे से टाइअप कर लिया। यह तय किया गया कि आंवले की कीमत वह स्वयं निर्धारित करेंगे। सिंडीकेट बनने से किसानों को भारी नुकसान होने लगा। हालत यह हो गई कि उन्हें इन कंपनियों को आंवला बेचने का विचार त्यागना पड़ गया। स्थानीय स्तर पर लगने वाली आंवले की मंडी में भी दलालों का यह असर रहा कि अब भी वहीं आंवले की कीमत निर्धारित करते नजर आते हैं।
कंपनियां तो कम पैसे में आंवला खरीदकर महंगे आंवला उत्पाद बेच रही हैं। एक दूसरे से टाइअप होने के कारण वह स्वयं के निर्धारित रेट पर आंवला की खरीद करते हैं। उनके साथ बिचौलिए भी उनकी हां में हां मिलाकर मालामाल हो रहे हैं। आंवला को इधर से उधर करने में ही वह लाखों का वारा न्यारा कर रहे हैं। उधर आंवला किसान हैं कि उन्हें साल भर की मेहनत के बाद भी सिर्फ लागत निकाल पाना भारी हो जाता है। अगर फसल ठीक नहीं आई तो बाजार में उनके ही बिकने की नौबत आ जाती है।
आंवला किसानों को प्रशासन इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित करता है। इसके लिए वह किसानों को पौधे, खाद, दवा और लगवाने के बाद सिंचाई के पैसे भी देता है। इतना सब तो प्रशासन किसानों के लिए करता है लेकिन उत्पादन का न तो रेट निर्धारित कर पाता है और न ही बाजार उपलब्ध करा पाता है। वन उपज माने जाने के कारण प्रशासन अपने हाथ खड़े कर देता है। आंवला उत्पादन में अग्रणी होने के बाद भी किसान मेहनत का फल नहीं पाता।
आंवला का उचित मूल्य न मिलने से कुछ किसानों ने इसे स्थानीय स्तर पर उत्पाद बनाकर बेचने का प्रयास भी किया। इनके उत्पाद बाहर के लोग तो खरीद ले जाते हैं, लेकिन जिले के लोग इस पर ध्यान ही नहीं देते। व्यापारी भी इसे बाहर के बाजारों में नहीं पहुंचा पाते। इसके चलते घरेलू उत्पाद प्रतापगढ़ के लोगों की अपेक्षाओं पर भी खरे नहीं उतर पाते।

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