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खतरे की घंटी : बंजर हो रहे खेत

Pratapgarh Updated Sat, 13 Oct 2012 12:00 PM IST
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प्रतापगढ़। जिले के किसानों के लिए खतरे की घंटी है। भूमि की उर्वरा शक्ति दिनोंदिन खोती जा रही है। उसके न सिर्फ प्रमुख पोषक तत्वों में कमी आ रही है बल्कि सूक्ष्म तत्वों में भी गिरावट सामने आई है। परिणामस्वरूप मिट्टी में पानी रोककर रखने की क्षमता खत्म हो रही है। हालत अगर यही रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में जमीन ऊसर हो जाएगी। इसका खुलासा मृदा परीक्षण के लिए आई लगभग दो हजार रिपोर्ट से हुआ है।
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जिले में पीएच मान के आधार पर दो तरह की भूमि पाई जाती है। इनमें अधिकांश हिस्सा तो सामान्य मृदा का है लेकिन कहीं-कहीं क्षारीय मिट्टी भी है। क्षारीय मृदा का तात्पर्य ऊसर भूमि से होता है। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में आए 19539 नमूनों में से 17852 की जो रिपोर्ट आई है वह काफी चिंताजनक है। मिट्टी से सभी प्रमुख पोषक तत्व जीवांश कार्बन (नाइट्रोजन), फासफोरस और पोटाश तेजी से घट रहे हैं। बेहतर उर्वरा शक्ति के लिए जीवांश कार्बन की मात्रा 0.80 प्रतिशत होनी चाहिए। मगर जिले में यह घटकर अतिन्यून स्तर अर्थात 0.20 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इसी तरह फासफोरस की मात्रा प्रति हेक्टेयर 40 किलोग्राम की जगह सिर्फ 10 किलोग्राम रह गई है। इसकी भी मात्रा अति न्यून स्तर पर पहुंच गई है। यही नहीं पोटाश की भी मात्रा घट रही है। उसकी मात्रा प्रति हेक्टेयर जहां 250 किलोग्राम होनी चाहिए वहीं जिले में यह मध्यम स्तर अर्थात 101 से 250 किलोग्राम के बीच पहुंच गई है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि मिट्टी से सिर्फ प्रमुख पोषक तत्व ही नहीं गायब हो रहे हैं बल्कि सूक्ष्म पोषक तत्व भी धीरे-धीरे गिरावट की ओर हैं। इनमें सल्फर, जिंक और लोहा की मात्रा तो सीमांत स्तर पर पहुंच गई है। इससे कृषि वैज्ञानिक चिंतित हो उठे हैं। हालांकि दो अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व कापर और मैगनीज की स्थिति जरूर ठीक-ठाक है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि जमीन की उर्वरा शक्ति घटने का कारण किसानों में जागरूकता का अभाव, गोबर और हरी खाद का इस्तेमाल न करना है। मिट्टी को जीवांश की मात्रा न तो गोबर के रूप में मिल पा रही है और न ही सनई और ढैंचे की खाद के रूप में। रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से जमीन ऊसर होती जा रही है। देशी और जैविक खादों का प्रयोग कर ही भूमि की उर्वरा शक्ति को बचाया जा सकता है।

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