जागरूकता का अभाव बन रहा मुसीबत

Pilibhit Updated Tue, 06 May 2014 05:31 AM IST
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पीलीभीत। बेशकीमती पानी बर्बाद करने में किसान भी पीछे नहीं है। जागरूकता के अभाव में किसान भी पानी के संरक्षण की कोशिश नहीं करते। इसके अलावा साठा धान वगैरह के उत्पादन से भूजल स्तर पर भी असर पड़ रहा है।
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यूकेलिप्टस से गिरता है भूजल स्तर
कृषि अधिकारियों के मुताबिक, साठा धान के साथ-साथ यूकेलिप्टस, मैंथा आदि के उत्पादन में भी पानी की बहुत ज्यादा खपत ज्यादा होती है। भूजल स्तर गिरने में इनका बड़ा योगदान है। इसलिए किसानों को यूकेलिप्टस के स्थान पर पापुलर के पेड़ लगाने चाहिए।
साठा धान बन रहा मुसीबत
साठा धान में हर तीसरे दिन पानी की जरूरत होती है, जबकि आमतौर पर अन्य धान में दस से पंद्रह दिन में पानी की जरूरत होती है, लेकिन मुख्य धान की फसल से एक एकड़ में करीब 20 क्विंटल, जबकि साठा धान करीब 38 क्विंटल पैदा होने से लोग ज्यादा पानी वाले साठा को बो रहे हैं। कृषि विभाग के अफसरों के मुताबिक यह इलाका कड़ाहीनुमा है, जिसमें तराई का यह जिला सबसे निचले स्थान पर है, जबकि बदायूं, बरेली ऊंचे स्थानों पर हैं। इससे पानी की खपत ऊपर से नीचे की ओर होने से पीलीभीत में अंधाधुंध दोहन का खामियाजा बदायूं और बरेली को भी झेलना पड़ रहा है। इससे भूजल स्तर गिरता जा रहा है।

प्रतिबंध को लेकर दायर की याचिका
साठा धान किसानों के लिए एक बड़े घाट का सौदा है। इससे जलसंकट के साथ पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है। पानी की बढ़ती बर्बादी और रोगकीट में इजाफा को देखते हुए साठा धान पर प्रतिबंध लगाने को हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। कोर्ट के आदेश पर होने वाले नुकसान का ब्यौरा जलप्रबंधन एवं नियंत्रण आयोग को दिया जा चुका है।
मंजीत सिंह, जिला उपाध्यक्ष भाकियू

साठा धान से होने वाले नुकसान से बेपरवाह किसान इसकी पैदावार करते जा रहे हैं जबकि इससे फायदा कम होता है। साठा के उत्पादन में हर तीसरे दिन पानी की आवश्यकता होता है। साठा में कोई खास लागत न लगने से किसान त्वरित लाभ तो देख रहे हैं लेकिन अगले सालों में यहां भी आसपास जनपदों जैसे हालात हो सकते हैं। किसानों को साठा की जगह हरी खाद जैसे ढैंचा, पटसन आदि को उगाना चाहिए। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी।
पीएल गंगवार, अपर जिला कृषि अधिकारी।
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