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परिवर्तन के साथ चटख हुए परंपरा के रंग

Pilibhit Updated Sun, 14 Oct 2012 12:00 PM IST
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पीलीभीत। उस दौर में जब बिजली नहीं थी और पैट्रोमैक्स भी नहीं, तब रामलीला दिन में हुआ करती थी। लोग महीनों से इसका इंतजार करते थे। रामलीला के दिन लोग खाना खा-पीकर पूरी फुरसत से आते, तन्मयता से रामलीला देखते थे। जिले में रामलीला के 127 साला सफर में बहुत कुछ बदल गया है। पहले भगवान राम का सिंहासन हाथों से उठाया जाता था, अब जीप पर बिजली की चकाचौंध के बीच राम दरबार सजता है। इन तब्दीलियों के बावजूद रामलीला की लोक परंपरा का रंग आज भी चटख बना हुआ है।
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1885 में पहली बार पंडित जानकी प्रसाद ने बाबू गणेश राय, साहू जगदीश प्रसाद, साहू नारायणदास के साथ मिलकर रामलीला का आयोजन किया था। इसमें मिली सफलता से उत्साहित होकर इन्हीं लोगों ने अपनी भूमि को रामलीला के लिए दान कर दिया था। अब परमठ मंदिर के महंत ओमकारनाथ ने पूर्वजों से मिली इस विरासत को संजो रखा है। चौथी पीढ़ी में भी यह परंपरा कायम कायम है।
बकौल महंत ओमकार, पहले बिजली नहीं थी, इसलिए दिन में रामलीला होती थी। बाद में पैट्रोमैक्स खरीदे गए तो दिन ढलने पर उन्हें जलाया जाता था। आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार के अधिकारी भी रामलीला देखने आते थे। एक कुनबे की रामलीला होती थी। सभी खा-पीकर रामलीला देखने बैठ जाते थे। शांति के माहौल में बूढ़े से लेकर बच्चे तक रामलीला के प्रसंगों को तन्मयता से देखते-सुनते थे। अब माइक का शोर, बिजली की चकाचौंध और संसाधनों से यह आयोजन आसान हो गया है। वक्त की कमी के कारण सामान्य तौर पर लोगों के उत्साह में कमी आई है, लेकिन यह भी सुखद है कि नई पीढ़ी टीवी और कंप्यूटर को छोड़कर इस आयोजन को देखने आ रही है।
तब............
1. एक कुनबे में रामलीला होती थी।
2. एक या दो परिवार के लोग ही पात्र बनते थे।
3. दर्शक कम, लेकिन उत्साह अपार था।
4. बिजली न होने के कारण दिन में होती थी।
5. रामदरबार के पात्रों को भगवान के समान सम्मान दिया जाता था।
6. शेषनाग के फन वाली आकृति के विशाल रथ कंधे पर ले जाए जाते थे।
7. बड़े कारोबारी और जमींदार आयोजन कराते थे।
अब..................
1. रामलीला का स्वरूप बढ़ा। संसाधनों से सजा आयोजन।
2. बच्चों और पुराने लोगों को छोड़ युवाओं में क्रेज कम हुआ।
3. भीड़ बढ़ी पर रामलीला में नहीं मेले में लगी लगन।
4. दिन से लेकर रात तक आयोजन की रहती है धूम।
5. पात्रों को देखने जुटते हैं बच्चे।
6. जीप पर सजाया जाता है सिंहासन।
7. कमेटी के लोग आयोजन कराते हैं।
व्यवस्था बदली पर परंपरा 1885 वाली
रामलीला मंदिर के नाम से मशहूर परमठ मंदिर के सर्वराकार और इस परंपरा को बरकरार रखने वाले 68 वर्षीय महंत ओमकारनाथ बताते हैं समय के साथ तमाम व्यवस्थाएं बदल गई, लेकिन रामलीला की परंपरा 1885 वाली ही है। रामलीला का मंचन एक स्थान पर न होकर विभिन्न प्रसंगों की लीला अलग-अलग स्थानों पर होती है। रामजन्म से धनुष यज्ञ की लीला का मंचन परमठ मंदिर में, राम बारात का भ्रमण नगर भर में, राम विवाह राजाबाग कॉलोनी स्थित पौराणिक मंदिर में, केवट संवाद की लीला एकता सरोवर यानि धन्नई ताल पर, बनवास का भ्रमण धीरेंद्र सहाय की बगिया में, चित्रकूट विश्राम स्थल शिवशक्ति बारातघर के पास बनाया जाता है। पश्चात सभी पात्र रामलीला मैदान पहुंचते हैं।
इन पीढ़ियों का रहा योगदान
पहली पीढ़ी : जानकी प्रसाद, बाबू गणेश राय, साहू जगदीश प्रसाद, साहू नारायण दास।
दूसरी पीढ़ी : जानकी प्रसाद के पुत्र पंडित चक्खन लाल।
तीसरी पीढ़ी : महंत श्याम सुंदर लाल।
चौथी पीढ़ी : महंत ओमकार नाथ।
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