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पीलीभीत की रामलीला में जुटीं अमेरिकी शोधार्थी

Pilibhit Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
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पीलीभीत। रामलीला में इस बार अमेरिकी शोधार्थी पामेला लॉथस्पिक और उनके बच्चों का उत्साह भी देखने लायक है। वैसे वह पिछली बार भी आईं थी, लेकिन महज एक-दो दिन ही रह पाईं थीं। वह रामलीला पर शोध कर रही हैं और उनके शोध का विषय ‘रामलीला पर राधेश्याम रामायण का प्रभाव’ है। वह न सिर्फ रामलीला के पात्रों का अभिनय देख रही हैं, बल्कि उसमें अपनी पूरी भागीदारी भी निभा रही हैं।
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रामलीला एक लोककला है। इसमें अनोखी आस्था की झलक दिखाई देती है। रामलीला कोई एक जाति-धर्म और वर्ग के लोगों के लिए नहीं, अपितु इसके दर्शक प्रत्येक धर्म और वर्ग के लोग होते हैं। रामलीला पर उनका साफतौर पर कहना है, रामलीला में स्त्री पात्र होने के बाद भी महिलाओं-कन्याओं की भागीदारी न होना अखरता है। सूर्पणखा और ताड़का जैसे किरदार, जब पुरुष कलाकार प्रस्तुत कर रहे होते हैं तो पुरुषों का वर्चस्व झलकता है, लेकिन यही भूमिका यदि महिलाएं अथवा कन्याएं करें तो इस बात का अहसास होगा कि नारी प्रधानता है।

अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने रामलीलाओं में लोगों की आस्था के बाद भी महिलाओं की भागीदारी न होने को चिंताजनक बताया। बोलीं, लड़कियां, नाटकों में, नृत्य के मंच पर, टीवी सीरियल और फिल्मों में अभिनय कर सकती हैं तो रामलीला में क्यों नहीं? वह कहती हैं कि कुछ लोग सिर्फ बच्चों की जिद पर टाइम पास करने रामलीला में जाते हैं, फिलहाल रामलीला में निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक के लोग जाने से अपने कदम नहीं रोक पाते, फिरभी लोककला का यह अनूठा मंच संघर्ष करता प्रतीत होता है, जो अत्यंत दुखदायी है।
पामेला लॉथस्पिक अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना में प्रवक्ता हैं। वह रामलीला पर किताब लिख रही हैं, जो अगले एक अथवा डेढ़ साल में आ जाएगी। पहली बार वह राधेश्याम रामायण पर और जानकारी के लिए 2006 में बरेली आईं थीं। इससे पहले 1993 में उन्होंने बनारस में रहकर हिंदी सीखी थी। वह भलीप्रकार हिंदी बोलती हैं, जिससे जल्द ही लोगों से घुलमिल जाती हैं। वह यहां अपने 13 वर्षीय पुत्र जोई, नौ वर्षीय बेटी उर्सुला और पांच वर्षीय बेटा लूलू के साथ यहां आई हैं। रामलीला में विदेशी मेहमानों के कारण दर्शकों में भी उत्साह देखा गया।

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