मौत के राजफाश की कीमत फकत दस रुपये

Pilibhit Updated Mon, 08 Oct 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। काम थोड़ा अटपटा भी है और मुश्किल भी। किसी की मौत का राज खोलना सिर्फ डॉक्टर ही जानते हैं। उनकी रिपोर्ट के आधार पर बड़ी से बड़ी घटनाओं के राजफाश होते हैं। जानकर हैरानी होगी कि सरकार की तरफ से इस काम का मेहनताना मात्र दस रुपये ही मिलता है, जो पिछले बीस साल से अधिक समय से चलता आ रहा है। डॉक्टर इसे लेने के लिए वर्षों से आवेदन भी नहीं कर रहे है।
जिला अस्पताल में तैनात बारह चिकित्सकों की ड्यूटी चार्ट रूट के अनुसार पोस्टमार्टम हाउस पर लगाई जाती है। बड़े मामलों में मजिस्ट्रेट आदेश पर पैनल टीम में दो से तीन चिकित्सक को भी पोस्टमार्टम का जिम्मा है। प्रदेश में सपा सरकार ने भले ही पोस्टमार्टम में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए एक पन्ने के स्थान पर तेरह पन्नों का प्रोफार्मा कर दिया हो। डॉक्टरों को शव का बारीकी से मुआयना कर एक-एक जख्म का उल्लेख करना होता है। ताकि विवेचना में दुश्वारियों का सामना न करना पड़े। क्योंकि विवेचना काफी हद तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर निर्भर होती है। कर्मचारियों को कैमरा चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही संदिग्ध व लावारिस शवों के बोन के साथ मांस, लीवर व पेट के कुछ और अंदरूनी हिस्सों को संरक्षित रखने के भी आदेश दिए।
पोस्टमार्टम की गोपनीयता के लिये स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी ही अंजाम देते हैं। विवेचना में पारदर्शिता लाने को ठोस कदम उठा लिए, लेकिन पारिश्रमिक को लेकर करीब तीस साल पुराने आदेशों को आज तक जिंदा रखे हैं। मेहनताने का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है। सभी डॉक्टरों ने कई सालों से पोस्टमार्टम से मिलने वाली धनराशि के भुगतान को आवेदन नहीं किया है।
शासन से पोस्टमार्टम के लिए दस रुपये का प्रावधान है, लेकिन चिकित्सक बिना पारिश्रमिक के कर्तव्यनिष्ठा के साथ पोस्टमार्टम का कार्य करतेे हैं। डॉक्टरों और फार्मेसिस्टों का मेहनताना बढ़ाने के पिछले बीस से पच्चीस सालों मेें महकमे ने कोई निर्णय नहीं लिया है।
- डॉ केके शर्मा, कार्यवाहक सीएमएस
पोस्टमार्टम में अधिक पारदर्शिता के लिए प्रारूप तो परिवर्तित कर दिया गया, लेकिन पारिश्रमिक को लेकर आज भी डॉक्टरों से अनदेखी की जा रही है। इस संबंध में महकमे की तरफ से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जाएगा।
डॉ राकेश तिवारी
सीएमओ

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