पैसा न हो तो बुढ़ापे में मिलती हैं ठोकरें

Pilibhit Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
पीलीभीत। आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस है। सैकड़ों बुजुर्गों को नहीं पता कि आज का दिन उनके नाम है। मालूम भी कैसे हो? सार्वजनिक रूप से कोई आयोजन तो होता नहीं जो इनको पता चलेगा। जो आयोजन होंगे वह कुछ खास जगहों पर होंगे। आम बुजुर्गों को इससे कोई सरोकार कहां? दो दशक में वृद्धों की पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में काफी बदलाव आया है। खाली जेब वाली वृद्धावस्था परिवार पर बोझ समझी जाने लगी है। लोग उनसे किनारा करने में ही भलाई समझते हैं। बुजुर्गों के लिए संचालित सरकारी योजना की स्थिति भी ऐसी नहीं कि उनका भला हो सके। ऐसे में बेचारे बुजुर्ग जिंदगी के बचे खुचे दिन बस किसी तरह गुजार रहे हैं।
शहर के वृद्ध सेवा संस्थान के आश्रम में 18 बुजुर्ग रह रहे हैं। इनके खाने पाने और रहने की व्यवस्था संस्थान करता है। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और स्वयं सेवी संस्थाएं कभी कभार यहां स्वास्थ्य शिविर लगाकर बुजुर्गों को इलाज मुहैय्या कराते हैं। ऐसे ही बेशुमार बेसहारा बुजुर्ग शहर के अनेक ठिकानों पर रहकर अपना वक्त काट रहे हैं। किसी ने मंदिर की शरण ले ली तो कोई मजारों के पास जा बसा है। यह वही लोग हैं जिनका कभी घर परिवार भी था और औलादें भी। समय के साथ सब कुछ बदल गया। किसी के बच्चों ने घर से बाहर कर दिया तो किसी की बीवी साथ छोड़ गई। अब तो उन्हें इन स्थानों पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का ही सहारा है। स्वाभिमानी और स्वस्थ बुजुर्गों ने दो वक्त की रोटी कोे मजदूरी का रास्ता चुन लिया।
अपनों ने किया बेघर
वृद्धाश्रम में रह रहे राम गोपाल रस्तोगी बरेली के रहने वाले हैं। बताते हैं कि चार बेटे जेवरात कारीगर हैं। एक ने मकान अपने नाम करा लिया। दूसरे ने पैसे पर कब्जा कर लिया। खाली हाथ हुए तो बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक बेटा पीलीभीत में रहता है। उसे उनसे कोई सरोकार नही। दवा को भी तरसते हैं।
अपनों ने मुंह मोड़ लिया
वृद्धाश्रम में चार साल से रह रही 67 वर्षीय मुन्नी देवी कहती हैं कि उनके दो बेटे शादी के बाद अलग हो गए। वह किराए के मकान में रहते हैं। पति गोपी नाथ मुनीम थे। बुढ़ापा आया तो शरीर जवाब दे गया। नौकरी भी छूट गई। मकान मालिक ने घर खाली करा लिया। दोनों वृद्धाश्रम आ गए। पति चले बसे।
बोझ नहीं बनना चाहता
शहर से सटे गांव के 67 वर्षीय जमालउद्दीन का शरीर कमजोर हो गया। वह स्वाभिमानी हैं। रिक्शा चलाकर गुजर बसर करते हैं। 33 बरस पहले बीवी का इंतकाल हो गया। बेटी की शादी कर दी। एक बेटा है, वह भी मजदूरी करता है। वह उस पर बोझ नहीं बना। वृद्धावस्था पेंशन आदि का कोई लाभ नहीं मिला।
यही बरताव उनके साथ हो तो.
जितेन्द्र सक्सेना का कहना है कि बुजुर्ग तो घर की रौनक होते हैं। उनके साथ न जाने किस तरह लोग ऐसा बर्ताव करते हैं कि उन्हें जिंदगी का बचा वक्त तेरे मेरे रहमो करम पर काटना पड़ता है। लोगों को सोचना चाहिए कि उन पर भी बुजुर्गी आएगी। उनके साथ ऐसा हो तो कैसा लगेगा।
0बहुत डरावनी है यह तस्वीर
मोहल्ला मोहम्मद वासिल की जोबिया मलिक बताती हैं कि बुजुर्गों को सताने वाले कभी सरसब्ज नहीं हो सकते। मां-बाप खुद तकलीफें उठाकर बच्चों की परवरिश यह सोचकर करते हैं कि बुढ़ापे में सहारा मिलेगा। बुढ़ापा आने पर औलाद दगा कर जाती है। समाज की यह तस्वीर बेशक बहुत डरावनी है।32 हजार बुजुर्गों को मिलती है पेंशन
समाज कल्याण विभाग बुजुर्गों के लिए वृद्धावस्था पेंशन योजना संचालित करता है। अभी करीब 32 हजार बुजुर्गों को 300 रुपये मासिक पेंशन हर छह मह पर मिल रही है। करीब एक हजार बुजुर्गों के आवेदन पत्र पेंडिंग हैं। महंगाई के इस दौर में 300 रुपये की मदद से इन बुजुर्गो का भला नहीं होता।

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