हालात से हारा शहीद माखन लाल का परिवार

Pilibhit Updated Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
अंडा बिक्री और मजदूरी से चल रही है परिवार की रोटी
पट्टे की भूमि मिली पर नहीं उगीं फसलें
पूरनपुर/ माधोटांडा। अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले शहीद माखन लाल का परिवार आजाद भारत में बेहाल है। रोटी, कपड़ा और मकान के लाले पड़े हैं। शहीद के परिजन अंडा बेच रहे हैं। आर्थिक तंगी को लेकर शहीद के भतीजे ने स्कूल तक जाना बंद कर दिया। रहने को मिला इंदिरा आवास जर्जर हो गया। पट्टे की मिली भूमि बंजर दी गई, जिस पर फसलें ही नहीं उगी।
मूलरूप से गांव मुजफ्फरनगर में जन्मे शहीद नत्थू लाल, माखन लाल ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला था। वर्ष 1937 मेें जब विधानसभा के चुनाव हुए थे, तो अंग्रेजी हुकूमत के समर्थन मेें राजा परिवार के उम्मीदवार राम बहादुर और कांग्रेस के उम्मीदवार के बीच कांटे की टक्कर थी। राजा परिवार काफी प्रभावशाली था और उस चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की हार होना तय मानी जा रही थी। इसके बावजूद कांग्रेस का झंडा उठाए नौजवान नत्थूलाल, माखन लाल पार्टी का प्रचार कर ब्रिटिश हुकूमत का विरोध कर रहे थे। सामान्य परिवार के युवकों द्वारा अंग्रेजी हुकूमत और राजा परिवार को यह सब गवारा नहीं हुआ। इस पर घर में घुसकर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। शहीदों की अंतिम यात्रा में आजादी के हजारों दीवाने उमड़े। नतीजा यह निकला कि अंग्रेजी हुकूमत के राजा उम्मीदवार के विरोध में जिले में एक भूचाल सा आ गया था। अंग्रेजी हुकूमत के उम्मीदार को बुरी तरह पराजित होना पड़ा था।

शहीद परिजनों को क्या मिली आर्थिक मदद
शहीद हुए माखन लाल अविवाहित थे। वर्ष 1953 में गांव छोड़कर माखन लाल के परिजन माधोटांडा मेें अपने मामा ढोड़ी लाल के पास आकर रहने लगे। परिवार में उनकी मां के अलावा भाई मिश्री लाल, जगदीश और ओमप्रकाश है। शहीद की मां के जीवित रहने तक पेंशन के सहारे ही परिवार का भरण पोषण चलता रहा। मां के कुछ दिनों बाद बड़े भाई मिश्री लाल की भी मौत हो गई। मिश्रीलाल के भी कोई संतान न होने को लेकर उनकी एक एकड़ भूमि को जगदीश और ओमप्रकाश ने बांट लिया। जगदीश को चार बीघा जमीन का पट्टा भी दिया गया, लेकिन भूमि बंजर होने को लेकर उसमें फसल ही नहीं हुई। दोनों भाईयों को इंदिरा आवास मिला। जो अब जर्जर हो गया है।

मजदूरी से हो रहा परिवार का पालन पोषण
शहीद माखन लाल के भाई जगदीश बुजुर्ग हो चुके है। उनका पुत्र भगवानदास लखीमपुर खीरी के पलिया में एक धान मिल में मजदूरी कर रहा है। ओमप्रकाश के दो पुत्र सुंदर लाल और प्रदीप कुमार अंडा बिक्री कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे है। साप्ताहिक बाजार के दिन ओमप्रकाश भी बाजार में रखे एक खोखे में बैठकर अंडा बिक्री करते है। ओमप्रकाश के छोटे पुत्र प्रदीप ने आर्थिक तंगी को लेकर स्कूल ही जाना बंद कर दिया।

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