प्रभु की प्राप्ति ही मानव का हो लक्ष्य: रविनंदन

Pilibhit Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
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पीलीभीत। काल के अनंत प्रवाह में अनगिनत लोग विलीन हो गए। नाम केवल उन्हीं लोगों का बचा जिन्होंने त्याग किया। धन जुटाना गृहस्थ जीवन में आवश्यक है, मगर धन ही सर्वोपरि है, उससे सब कुछ हासिल हो सकता है, यह सोच गलत है। उक्त विचार सोमवार को श्रीराधा माधव संकीर्तन मंडल की ओर से अग्रवाल सभा भवन में श्रीमद्भागवत भक्ति ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन भागवत भूषण रविनंदन शास्त्री ने व्यक्त किया। उन्होंने कहा भक्ति शब्द का मूल अर्थ ही सेवा है। विनम्रता ही भक्ति का मुख्य श्रृंगार है। जो व्यक्ति विनम्र नहीं वह भक्त भगवान का भक्त नहीं। उन्होंने कहा देश में अंग्रेजों ने लोगों के आपसी फूट डालकर हमारी परंपराओं से लोगों को अलग कर दिया। देशवासियों को भारतीय होने का गर्व होना चाहिए। कथा के दौरान श्रीवृंदावन से आईं श्रीकृष्ण चरणानुरागी पुरुषोत्तम सुखई ने भक्ति गीतों पर नृत्य कर पंडाल में समां बांध दिया। भागवत कथा में नीलेश अग्रवाल, श्रीभगवान अग्रवाल, प्रियंक अग्रवाल, उमेश, बिल्ला, पंकज टोनी, दीपक गोयल, राजीव, अमित, अवधेश, प्रमोद, लतारानी, मीरा, नीरजा जोशी आदि लोग उपस्थित रहे।
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गायों की दुर्दशा पर जताई नाराजगी
भागवत भूषण रविनंदन शास्त्री ने सोमवार को गौशाला का जायजा लिया। गौशाला में गायों की दुर्दशा देखकर अफसोस जताया। उन्होंने कहा कि एक गाय अकेले दस एकड़ खेत को खाद उपलब्ध करा सकती है। जो लोग दूध दुहने के बाद उन्हें सड़कों पर छोड़ देते और लोगों के डंडे सहने और पॉलीथीन खाने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसे लोगों से इस संसार में बड़ा पापी कोई नहीं है। गौ मूत्र से बड़े-बड़े रोग ठीक हो जाते हैं।
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