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मुजफ्फरनगर दंगे के मुकदमों की वापसी से प्रशासन का इंकार

अमर उजाला/ब्यूरो, मुजफ्फरनगर Updated Mon, 13 Aug 2018 12:26 AM IST
मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान शहर में तैनात सेना के जवान।
मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान शहर में तैनात सेना के जवान। - फोटो : अमर उजाला
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वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली में हुए दंगे के 131 मुुकदमे वापस लेने की राज्य सरकार की प्रक्रिया को झटका लगा है। इस संबंध में शासन को भेजी रिपोर्ट में डीएम ने प्रशासनिक स्तर पर वाद वापसी से इंकार कर दिया है और गेंद शासन के पाले में डाल दी है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कोर्ट में विचाराधीन सभी मुकदमों की वापसी किया जाना संभव नहीं है। शासन अपने स्तर से जो भी निर्णय लेगा, वह सर्वमान्य होगा।
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इन मुकदमों में सांसद सजीव बालियान, विधायक संगीत सोम, विधायक उमेश मलिक आदि से जुड़े मुकदमे शामिल नहीं हैं। पांच फरवरी 2018 को खाप चौधरियों और भाजपा नेताओं ने सीएम योगी आदित्यनाथ से भेंट की थी। प्रतिनिधिमंडल ने सीएम को 131 मुकदमों की सूची सौंपी थी, जिनमें कहा गया था ये मुकदमे रंजिशन और पुलिस द्वारा दर्ज कराए गए हैं।

राज्य सरकार ने मार्च 2018 में डीएम से मुकदमों की वापसी को लेकर 13 बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी थी। सरकार के फैसले पर विपक्षी पार्टियों ने हो-हल्ला भी मचाया था। कैराना उप चुनाव में भी यह मुद्दा गर्र्माया था। डीएम राजीव शर्मा ने आठ अगस्त को शासन को यह आख्या गुपचुप तरीके से भेज दी है। जानसठ के कवाल कांड के बाद सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और शामली में दंगा भड़का था, जिसमें 65 से ज्यादा बेगुनाहों की मौत हो गई थी। हिंसा से गांव छोड़ आए 50 हजार लोगों ने  शरणार्थी कैंपों में शरण ली थी।

मुजफ्फरनगर दंगों के जिन मुकदमों की 13 बिंदुओं पर शासन ने रिपोर्ट मांगी थी, वह प्रेषित कर दी गई है। एसएसपी,संयुक्त निदेशक अभियोजन और जिला शासकीय अधिवक्ता की आख्या ली गई थी। वादों को प्रशासनिक स्तर पर वापसी लिया जाना संभव नहीं है। राजीव शर्मा, डीएम मुजफ्फरनगर।

सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगे में दर्ज हुए फर्जी मुकदमे वापस लेने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में डीएम उन्हें वापस लेने से नहीं रोक सकते हैं। इसमें सरकार का आदेश है। उस समय सपा की सरकार थी और भाजपाइयों सहित अन्य लोगाें पर बड़ी संख्या में फर्जी मुकदमे दर्ज हुए थे, जिन्हें वापस कराया जायेगा। ठा. संगीत सोम, विधायक

सरकार पर लोकसभा चुनाव से पहले निर्णय का दबाव            
दंगे के 131 मुकदमे वापस लेना का अब योगी सरकार पर दबाव बनेगा। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव से पहले ही इस मामले में अपना निर्णय लेना होगा। सरकार ने ढिलाई की तो विपक्षी इसे मुद्दा बना लेंगे। भाजपा के रणनीतिकार पूरे मामले को चुनावी लाभ-हानि से जोड़कर चल रहे हैं।        
डीएम राजीव शर्मा द्वारा 131 मुकदमे वापिस लेने में प्रशासन की असमर्थता जताने के बाद मामला पूरी तरह शासन के पाले में पहुंच गया है।

इस पूरे प्रकरण में अब प्रदेश सरकार को ही निर्णय लेना है। भाजपा ने इस प्रकरण को उछालकर राजनीतिक गलियारों में मुद्दा बनाने की कोशिश में काफी दिनों से जुटी हुई थी। जिलाधिकारी के निर्णय से भाजपाइयों को काफी झटका लगा है। वहीं, विपक्षियों को सूबे की योगी सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है, जिससे भाजपा के हिंदुत्व को बल मिले।

इस पूरे मामले को भाजपा के रणनीतिकार एक सोची समझी योजना के हिसाब से आगे बढ़ा रहे हैं। यह भी लग रहा है कि सरकार पर 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रकरण में निर्णय का दबाव है। भाजपा चाहती है कि दंगे के मुकदमे खत्म हों। मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया पूरी होते ही भाजपा माहौल को भुनाने का काम भी करेगी। सूत्रों की माने तो अगले तीन माह में प्रदेश सरकार मुकदमे में वापिस लेने की प्रक्रिया पूरी कर सकती है।        

डीएम की रिपोर्ट पर उन्हें आश्चर्य नहीं है। ऐसी ही उम्मीद थी। बेगुनाहों को फर्जी मुकदमों से बचाने के लिए पुन: सीएम योगी आदित्यनाथ से मिलेंगे। नंगला मंदौड़ पंचायत को लेकर भाजपाइयों के खिलाफ जो मुकदमे दर्ज है, उनको खत्म करने को लेकर सरकार से कोई निवेदन नहीं किया गया है।
डॉ संजीव बालियान, पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद

मुकदमे वापसी पर अंतिम फैसला शासन को लेना है। डीएम की रिपोर्ट का प्रक्रिया पर असर नहीं पड़ेगा। जिन 131 मुकदमों की वापसी के लिए राज्य सरकार से आग्रह किया गया था, उनमें वो मुकदमे नहीं है, जो हम पर दर्ज है। रंजिश के आधार पर दर्ज कराए गए मुकदमों को खत्म कराने का प्रयास जारी रहेगा।
उमेश मलिक, बुढ़ाना विधायक

- दंगे के मुकदमों से हिंदु और मुस्लिम दोनों की पक्ष पीड़ित है। पुलिस की ओर से भी हिंसा के बाद गलत मुकदमे दर्ज कर दिए गए। बीते पांच साल से मुकदमों में फंसे लोग आर्थिक और मानसिक पीड़ा झेल रहे है। डीएम की रिपोर्ट एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। प्रदेश की भाजपा सरकार को अंतिम फैसला लेना है। दोनों पक्षों में किसी भी हालत में समझौता होना चाहिए, तभी भाईचारा और सौहार्द कायम रहेगा - चौधरी नरेश टिकैत, भाकियू अध्यक्ष


मुजफ्फरनगर दंगा : योगी सरकार के पाले में गई गेंद
सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और शामली में हुए दंगे से जुड़े 131 मुकदमों की वापसी का मामला अब सीएम योगी आदित्यनाथ के फैसला पर टिक गया है। शासन के आदेशों पर तैयार रिपोर्ट में डीएम ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक स्तर पर उक्त मुकदमों को वापसी नहीं लिया जा सकता। ऐसे में न्याय विभाग की कमेटी डीएम की रिपोर्ट का आंकलन करने के बाद पत्रावली सीएम को भेजेगी। दोनों समुदाय के लोगों के खिलाफ दर्ज 131 मुकदमों में मार्च में प्रशासन से 13 बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी गई थी।

राज्य सरकार को भेजी डीएम की रिपोर्ट से सियासी हल्के में हलचल मच गई है। पांच माह में वाद संख्या और अपराध की धाराओं के अंतर्गत तैयार की गई रिपोर्ट में प्रशासन ने मुकदमे वापसी मामले में अपने कदम पीछे खींच लिए है। डीएम राजीव शर्मा ने शासन को भेजी रिपोर्ट में स्पष्ट लिख दिया है कि प्रशासनिक स्तर पर वाद वापसी संभव नहीं है, यह निर्णय शासन स्तर पर ही लिया जाए। कुल मिला कर मुकदमे वापसी की गेंद फिर से शासन के पाले में चली गई है।

पूरे मामले को लेकर सबसे बड़ा संकट भाजपा के सांसदों और विधायकों पर है, क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकारें गठित हुईं। भाजपा नेताओं ने सार्वजनिक मंचों से एलान किया था कि दंगे में जिनके खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कराए गए हैं वे सभी वापस कराए जाएंगे। 5 फरवरी 2018 को लखनऊ में पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद डॉ संजीव बालियान, भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत, बुढ़ाना के विधायक उमेश मलिक, गठवाला खाप के राजेंद्र सिंह लिसाढ़, लांक थांबेदार राजवीर सिंह, अहलावत खाप के चौधरी गजेंद्र सिंह, जाट महासभा के राष्ट्रीय सचिव सुभाष चौधरी, शामली जाट महासभा के अध्यक्ष प्रताप चौधरी आदि ने सीएम योगी आदित्यनाथ के समक्ष मुकदमे वापसी की सूची रखी थी।

प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद शासन स्तर पर प्रक्रिया तेज हुई। एक माह के उपरांत राज्य सरकार ने 131 मुकदमों पर जिलाधिकारी से बिंदुवार आख्या मांगी थी। इन दर्ज मामलों में ऐसे वादों की संख्या भी कम नहीं है, जिसमें रंजिश के आधार पर लोगों को फंसाया गया है। बीते पांच साल से आवाज उठ रही है कि फर्जी मुकदमे प्रदेश सरकार खत्म करें। हालांकि डीएम की रिपोर्ट के बाद प्रशासन स्तर पर वाद वापसी की उम्मीदें खत्म हो गई है। न्याय विभाग की कमेटी डीएम की आख्या का आंकलन करेगी। इसके बाद कमेटी अपनी रिपोर्ट सीएम योगी आदित्यनाथ को देगी। मुकदमे वापसी का निर्णय पूरी तरह सीएम के विवेक पर निर्भर हो गया है।

सियासी दांव-पेंच में उलझा मामला
मुजफ्फरनगर। दंगे के मुकदमों की वापसी को लेकर सियासी दांव-पेंच बीते आठ माह से चल रहे हैं। सपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की सहमति के बाद दिल्ली में दोनों समुदाय के लोगों की बैठक बुलाई गई थी। बैर-भाव भूला कर अमन चैन के लिए समझौते की पहल की गई।

राष्ट्रीय जाट संरक्षण समिति के अध्यक्ष विपिन बालियान के प्रयास से भी हिंदू और मुस्लिम नेताओं की मुकदमे वापसी को लेकर कई पंचायत हुई। इसी बीच सांसद डॉ संजीव बालियान की पहल पर राज्य सरकार ने मुकदमों की वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ करा दी। सपा, कांग्रेस और रालोद के अलावा भाकियू, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने भी समझौते की मुहिम को समर्थन दिया।

बढ़ सकती है सांसद और विधायकों की मुश्किलें
दंगे के मुकदमों की वापसी प्रक्रिया में नंगला मंदौड़ पंचायत के वे दो मुकदमे शामिल नहीं है, जिनमें दो सांसद और तीन विधायक आदि आरोपी हैं। 27 अगस्त 2013 को जानसठ कोतवाली के गांव कवाल में बहन से छेड़छाड़ को लेकर हुए संघर्ष में तीन युवकों की मौत हो गई थी। मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव तथा कवाल के शाहनवाज की जान चली गई थी। कवाल कांड ने ऐसा तूल पकड़ा कि जिले में सांप्रदायिक तनाव हो गया।

इसी दौरान घटना के विरोध में खालापार में जुमे की नमाज के बाद मुस्लिमों ने तत्कालीन डीएम कौशलराज शर्मा और एसएसपी सुभाषचंद दूबे को ज्ञापन सौंपा था। हिंदू संगठनों और भाजपाइयों ने नंगला मंदौड़ में 31 अगस्त और फिर 7 सितंबर 2013 को दो पंचायत की। उसी के बाद जिले में दंगा भड़क़ा था।

नंगला मंदौड़ की पंचायतों में भड़काऊ भाषण को लेकर बिजनौर सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह, सांसद डॉ संजीव बालियान, बुढ़ाना विधायक उमेश मलिक, थानाभवन विधायक एवं मंत्री सुरेश राणा, सरधना विधायक संगीत सोम, विहिप नेत्री साध्वी प्राची समेत 19 लोगों के खिलाफ दो मुकदमें दर्ज हैं। दोनों मुकदमे एसीजेएम द्वितीय की कोर्ट में चल रहे हैं। हालांकि अभी तक उक्त सभी पर आरोप तय नहीं हुए है।

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