शुक्रताल में आस्था की ‘गंगा’

Muzaffar nagar Updated Mon, 26 Nov 2012 12:00 PM IST
शुक्रताल। श्रीमद्भागवत की उद्गम स्थली शुक्रताल में कार्तिक गंगा स्नान को बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचने शुरू हो गए हैं। गंगा किनारे लगी तंबुओं की कतार और मंदिरों तथा आश्रमों में श्रद्धालुओं की भीड़ आस्था की इस डोर को मजबूत कर रही है।
शास्त्रों के अनुसार पवित्र माने गए कार्तिक मास में पूजा-अर्चना और गंगा स्नान को श्रेष्ठ पुण्य कर्म माना गया है। जनपद में कस्बा मोरना के निकट स्थित शुक्रताल को पौराणिक नगरी का दर्जा मिला है, जिसे प्राचीन ग्रंथ भी पुष्ट करते हैं। यहां तक कि महाकवि कालिदास की अनुकृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में भी शुक्रताल का जिक्र आता है। महाकवि ने इस ग्रंथ में ‘शुक्कावतार’ यानि शुक्रावतार तीर्थ का उल्लेख किया है, जिसे विद्धान वर्तमान शुक्रताल तीर्थ के रूप में ही मान्यता देते हैं। माना जाता है कि प्राचीन काल में कण्वाश्रम से महाराज दुष्यंत से मिलने हस्तिनापुर जाते समय शकुंतला की अंगूठी शुक्रताल में ही गंगा पूजन करते हुए खो गई थी। इस बात को इससे भी बल मिलता है कि शुक्रताल से कण्वाश्रम यानि कोटद्वार तथा हस्तिनापुर निकट ही हैं। इसके अलावा, पांडवों के वंशज महाराज परीक्षित को भी इसी स्थान पर मोक्ष प्राप्ति हुई थी। स्वामी ओमानंद महाराज ने बताया कि शुकतीर्थ को 68 तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ मोक्षदायक तीर्थस्थल माना गया है।
वर्तमान काल में शुक्रताल का जीर्णोद्धार करने का श्रेय वीतराग स्वामी कल्याणदेव जी महाराज को जाता है, जिन्होंने 50 के दशक में यहां गंगा स्नान मेले का शुभारंभ किया। स्वामीजी द्वारा लाला इंद्रप्रकाश, तुलाराम, जयप्रकाश और जगत प्रकाश को सबसे पहले लगे मेले का संयोजक बनाया गया था। बाद में यह जिम्मेदारी जिला पंचायत के पास चली गई। इसके बाद तो शुक्रताल देश के तीर्थ मानचित्र में स्थापित ही हो गया। कार्तिक पूर्णिमा के अलावा गंगा दशहरा, बैशाखी, शरद चतुर्दशी और पितृ विसर्जनी अमावस्या को भी शुक्रताल में गंगा स्नान मेलों का आयोजन होता है। फिलहाल शुक्रताल में कार्तिक गंगा स्नान मेले को लेकर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई है। श्री शुकदेव आश्रम में कथा वाचकों के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत की अमृत वर्षा हो रही है, इसके अलावा भागवत पीठ और दंडी आश्रम में भी पांच कथाएं हो रहीं हैं।

उद्घाटन आज, मुख्य स्नान 28 को
तीर्थनगरी में कार्तिक गंगा स्नान मेले का विधिवत उद्घाटन सोमवार को गंगा घाट पर पूजा-अर्चना कर किया जाएगा। इसके लिए गंगा घाट और मंदिरों को भव्य ढंग से सजाया गया है। मुख्य स्नान 28 नवंबर को होगा, जिसकी तैयारियों में प्रशासन जुटा हुआ है।

संत वाणी
कार्तिक पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान कर भगवान विष्णु या अपने इष्ट की आराधना करनी चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और पूजा-अर्चना से ही कलियुग में मोक्ष प्राप्ति होती है।
स्वामी ओमानंद ब्रह्मचारी, अधिष्ठाता, श्री शुकदेव आश्रम।

कार्तिक माह में स्नान का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है, जो शास्त्रों में भी वर्णित है।
स्वामी केशवानंद सरस्वती, संचालक, हनुमत धाम।

कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान, दीपदान और हवन करने से सांसारिक पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने सृष्टि और वेदों की रक्षा के लिए मतस्य अवतार धारण किया था।
ब्रह्मचारी गुरुदत्त महाराज, संचालक, दंडी आश्रम।

कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा गया है। भगवान शिव ने इसी दिन त्रिपुरासुर नामक असुर का अंत किया था।
परमयोगिनी माता राज नंदेश्वरी

इस दिन उपवास करके भगवान का स्मरण एवं चिंतन करने से फल की प्राप्ति होती है। रात्रि में व्रत और जागरण करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं।
स्वामी कुलभूषण, सच्चप्रकाश आश्रम।

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