ऐसे थे आजादी के दीवाने

Muzaffar nagar Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
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मुजफ्फरनगर, 14 अगस्त। स्वाधीनता संग्राम में योगदान देने वाले जनपद के कस्बा पुरकाजी निवासी शुगनचंद मजदूर का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है। बाल्मीकि परिवार में जन्मे शुगनचंद मजदूर ने वर्ष 1940 में ही देश आजाद होने की घोषणा करते हुए जिला मुख्यालय पर न्यायालय जिलाधिकारी में घुसकर कलेक्टर की कुर्सी पर कब्जा कर लिया था। अंग्रेजी हुकूमत जब तक संभलती, उन्होंने तीन अर्जियों पर फैसला भी सुना दिया। उनके साथियों ने भी न्यायालय के भीतर और बाहर तिरंगा लहराकर वंदे मातरम् के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। इस मामल में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा शुगनचंद मजदूर को साढे़ चार साल कठोर सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी।
कस्बा पुरकाजी निवासी बाल्मीकि इतवारी लाल के घर 13 मार्च 1914 को जन्मे शुगनचंद मजदूर के अंदर बचपन से ही देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी। नौ जुलाई 1923 को कस्बे के प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर मुंशी हाजी हसन ने बाल्मीकि परिवार से होने के कारण हो रहे विरोध के बावजूद भी शुगनचंद को स्कूल में दाखिला दिया। वर्ष 1930 में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद शुगनचंद मजदूर अपने साथियों गावं खाईखेड़ी निवासी चंद्रसेन त्यागी और पचेंड़ा निवासी रामजी लाल के साथ आजादी की लड़ाई में कूद पडे़। उस वक्त मुजफ्फरनगर में अंग्रेज जेबी लिंच कलेक्टर पद पर तैनात थे। आठ मई 1940 को शुगनचंद मजदूर साथियों के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे और न्यायालय जिलाधिकारी पहुंचकर कलेक्टर जेबी लिंच की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया। रामजीलाल ने कलेक्टर की अदालत में और उसके बाहर तिरंगा लहराकर ‘सुभाष चंद्र बोस जिंदाबाद’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। अदालत के बाहर खडे़ चंद्रसेन ने अर्दली बनकर फरियादियों को आवाज लगानी शुरू कर दी ‘चलो, आजाद हिंदुस्तान के कलेक्टर साहब के इजलास में अपनी अर्जी देने वालों, चलो। आजाद हिंदुस्तान के मुजफ्फरनगर जिले के कलेक्टर साहब श्रीशुगनचंद मजदूर अदालत में विराजमान हैं, अपनी-अपनी अर्जी दो और फौरन न्याय पाओ।’ इसके बाद अदालत में कलेक्टर की कुर्सी पर बैठे शुगनचंद मजदूर ने पेशकार से तीन फाइलें छीनकर उन पर त्वरित फैसले सुना दिए, जिससे हड़कंप मच गया। सूचना पाकर पुलिस कलेक्टर न्यायालय पहुंची और सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। मामले में शुगनचंद मजदूर को साढे़ चार साल के सश्रम कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। देश की आजादी के बाद शुगनचंद मजदूर 1962 में भोपा और 1967 में जानसठ क्षेत्र से विधायक भी चुने गए।

अब्दुल रहीम की मां को जला दिया था जिंदा
मुजफ्फरनगर। स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने वाले सेनानी थानाभवन निवासी काजी अब्दुल रहीम की मां असगरी बेगम को अंग्रेजों ने अक्टूबर 1857 में जिंदा जला दिया था। जिले के ही ठाकुर नवल सिंह और हरनाम सिंह को भी जबरन फांसी दी गई तथा हिमाचल सिंह को काला पानी भेज दिया गया, जिनकी वहीं 35 साल बाद मौत हो गई। इनके अलावा गांव खेड़ी के मैदा सिंह, वजीरा, शेर सिंह और बच्ची राम, मीरापुर कलां के गुलाम गौस खां, मेघा शकरपुर के साधुराम गुर्जर, भोकरहेड़ी के इमाम बख्श और अजमत अली, सैदपुर के भगवान सिंह, सोहंजनी तगान के मोहकम सिंह त्यागी, मुंडभर के सगवा सिंह और पुरबालियान के हरपाल सिंह ने भी स्वतंत्रता संग्राम में सराहनीय योगदान दिया।

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