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आर्थिक मंदी की आहट ने उड़ाए निर्यातकों के होश

Moradabad  Bureauमुरादाबाद ब्यूरो Updated Sat, 17 Aug 2019 02:00 AM IST
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मुरादाबाद। अमेरिका और चीन के बीच शुरू हुई ट्रेड वार और भारत को लेकर डब्ल्यूटीओ पर बढ़ते अमेरिकी दबाव ने मुरादाबाद के हस्तशिल्प उद्योग की कमर तोड़ दी है। विकासशील देशों को मिलने वाला जीएसपी दरजा भारत से पहले ही छीन चुके अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अब भारतीय निर्यातकों को मिलने वाले सभी प्रोत्साहन खत्म करने का दबाव विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) पर बनाया है। बदले हालात में दुनिया के तमाम देशों ने कारोबारी आदेशों में छंटनी शुरू कर दी है। इसे मंदी की आहट मानकर निर्यातक परेशान हैं।
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हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसीएच) के पूर्व अध्यक्ष चेयरमैन सतपाल का कहना है कि मुरादाबाद से हस्तशिल्प का अधिकतर निर्यात डिपार्टमेंटल स्टोर्स या फिर डिस्काउंटर्स को होता है। बदली परिस्थितियों में इन्होंने कारोबारी आदेशों में छंटनी शुरू कर दी है। अमेरिका ने व्यापार के मामले में भारत को विकासशील देश मानने से इंकार कर दिया है। ट्रंप प्रशासन ने भारत से जीएसपी (जनरलाइज सिस्टम ऑफ प्रफेंस) छीन लिया है। अब विकसित देशों की ही तरह भारतीय उत्पादों पर भी अमेरिका में उत्पाद शुल्क लग गया है। जिसकी वजह से अमेरिकी डिपार्टमेंटल स्टोर्स पर भारतीय उत्पाद अन्य विकासशील देशों की तुलना में महंगे हो गए हैं। मुरादाबाद से अमेरिका को करीब 5000 करोड़ रुपये का सालाना निर्यात होता है। जीएसपी खत्म होने पर अमेरिकी खरीददारों ने निर्यातकों पर तीन से चार प्रतिशत तक दाम करने का दबाव बनाया है। सतपाल का कहना है कि इसके अलावा अमेरिका के दबाव में सरकार एमईआईएस को खत्म करने का फैसला कर चुकी है। इससे मुरादाबाद के निर्यात पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ेगा। उनका कहना है कि जनवरी 2020 में जिस मंदी के आने की आसार दिख रहे थे, हस्तशिल्प उद्योग को उस मंदी का सामना सितंबर माह सेे ही करना पड़ेगा। इसके लिए अमेरिका और चीन के बीच चल रही ट्रेड वार सीधे तौर पर जिम्मेदार है। टॉप एक्सपोर्ट अवार्ड हासिल करने वाले सीएल गुप्ता एक्सपोर्टस के मालिक अजय गुप्ता का कहना है कि मौजूदा हालात मंदी का संकेत हैं। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया पर आर्थिक मंदी का साया है। निर्यातकों का कहना है कि हस्तशिल्प उद्योग को बचाने के लिए सरकार को हस्तशिल्प के सभी उत्पादों पर जीएसटी को घटाकर पांच प्रतिशत कर देना चाहिए। कुछ निर्यातक चीन की तर्ज पर 15 प्रतिशत तक मुद्रा अवमूल्यन की भी मांग कर रहे हैं। निर्यातकों ने खर्चों में कटौती के रूप में कर्मचारियों की छंटनी जैसे कदम उठाना शुरू कर दिए हैं।
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