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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष - भजन : आएंगे तो खाएंगे भी, गाएंगे भी

अभिनव चौहान/ अमर उजाला ब्यूरो, मुरादाबाद Updated Sun, 05 Jun 2016 03:33 PM IST
भजन ढाबा
भजन ढाबा
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  • पुरानी ईंटों के प्रयोग से बनाई है पूरी ईमारत

  • पुरानी लकड़ी का हुआ है प्रयोग, 40 प्रतिशत तक बचाते हैं बिजली 

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अगर आप कहीं हाईवे पर जा रहे हैं और आपको जबरदस्त भूख लगी हो तो आप सबसे पहले ढूंढते हैं एक शानदार रेस्टोरेंट। मगर हाईवे के खाने का जो लुत्फ आप ढाबे पर उठा सकते हैं वो किसी चमचमाते रेस्टोरेंट में नहीं। लेकिन अगर आपको हाईवे पर ऐसा ढाबा मिल जाए जो न केवल लजीज खाना परोसता हो बल्कि आपको एक अलग तरह के रेस्टोरेंट से वाबस्ता भी कराता हो तो कैसा रहे।

जी हां ऐसा एक ढाबा है दिल्ली से मुरादाबाद के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 24 पर गजरौला में, जिसका नाम है : भजन। और ये खास इसलिए हैं क्योंकि ये अपनी तरह का पहला ग्रीन ढाबा है। इतना ही नहीं ढाबा संचालक का दावा है कि भजन ढाबा भारत का भी पहला ग्रीन ढाबा है वो भी स्वगृह प्रमाणित।


दरअसल स्वगृह केंद्र सरकार और एक निजी संगठन का संयुक्त उपक्रम है जो देश में ऐसी इमारतों को प्रमाण पत्र देती जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती। भजन ढाबा इस प्रमाण पत्र को हासिल कर चुका है। लेकिन केवल इतना भर जानकर आप इस ढाबे के मुरीद कैसे हो जाएंगे। आपको आकर्षित करेगी इसकी बनावट और उसकी गुणवत्ता। ये सब किया है दो भाइयों की जोड़ी ने - प्रेम सिंह बेदी और कुंवर विक्रमजीत सिंह बेदी के एक विचार ने।

उनके पिता इंदर पी. सिंह बेदी ने गजरौला में एक चाय की स्टाल से अपना कारोबार शुरू किया था। अपने रहते उन्होंने उस टी-स्टाल को एक ढाबे के रूप में बदल दिया। यह ढाबा सुपरस्टार हीमैन धर्मेन्द्र के परिवार के परिवार का पसंदीदा ढाबा रहा है। इसके अलावा ईशा देओल, कैलाश खेर, जॉन इब्राहिम, मनोज बाजपेयी, स्वरा भास्कर जैसे तमाम सितारे यहां आ चुके हैं।

पिता इंदर सिंह बेदी की बताई बात-अपनी जमीन से जितना लो उतना वापस भी करों, दोनों भाइयों के जहन में बस गई। उनके देहांत के बाद उन्होंने ऐसे एक ढाबे का सपना देखा जिसे बनाने में प्रकृति से कुछ भी नया न लेना पड़े, बल्कि उसे लिया हुआ वापस कर सके। इसी का नतीजा है नया भजन ढाबा।

पहली बार देखने में आपको ये बिना प्लास्टर की हुई इमारत अर्धनिर्मित सी लगेगी। लेकिन यही इसकी खासियत है। भजन ढाबे को बनाने में सभी पुरानी ईंटे प्रयोग की गई हैं। उस पर कहीं किसी दीवार पर प्लास्टर नहीं किया गया। दीवारों को इस तरह से बनाया गया है कि अंदर और बाहर की दीवार में करीब छह इंच का होलो गैप है। जो हवा को लॉक करके रखता है। इससे न तो गर्मियों में इमारत गर्म होती है और न ही सर्दियों में ठंडी। आप जिस मौसम में भी जाएंगे इमारत के अंदर और बाहर के तापमान में आपको करीब छह से दस डिग्री तक का फर्क अपने आप महसूस होगा। तभी तो इस जून की चिलचिलाती गर्मियों में भी आप केवल एक सिलिंग फेन के नीचे आराम से बैठ पाते हैं।


दूसरी खास बात है कि सुबह सूरज दिखने से लेकर शाम को अंधेरा होने तक पूरे ढाबे में कहीं एक जीरो वाट का बल्ब भी नहीं जलता, फिर भी कहीं रोशनी की कमी नहीं होती। इसका फायदा ये होता है कि जितनी बिजली अन्य किसी रेस्टोरेंट में खर्च होती है उसके मुकाबले ये अपनी करीब 40 प्रतिशत से अधिक बिजली बचा लेते हैं। जहां उनके ठीक सामने स्थित मैकडोनाल्ड 250 किलोवाट और बराबर में स्थित केएफसी जैसे मल्टि नेशनल फूड चेन 200 किलोवाट के बिजली कनेक्शन से अपना खर्च चलाते हैं।

ऐसे में उतनी ही जगह में बना उनका यह विशेष ढाबा महज 60 किलोवाट के कनेक्शन से संचालित हो रहा है। इमारत की बनावट की वजह से जहां मैकडी और केएफसी करीब 50 टन से अधिक भार में भारी भरकम एसी चलाते हैं जो इस ढाबे में महज 25 टन का ऐसी काम आता है। थोड़ा आगे बढ़ें तो इस ढाबे के निर्माण में केवल चिनाई के लिए सीमेंट और रेता प्रयोग किया गया है। पूरे भवन में बीम को छोड़कर किसी दीवार या लेंटर में सरिये का प्रयोग नहीं हुआ।

इमारत का लेंटर प्राचीन भारतीय इमारतों के डाट शैली पर तैयार किया है जिससे यह पूरे ढांचे के भार को विकेंद्रित कर देती है। ऐसे में यह भूंकप के झटकों को अन्य इमारतों के मुकाबले 30 गुना तक अधिक झेल सकती है। पूरी इमारत पर रंग रोगन नहीं कराया गया, क्योंकि वो इमारत की पर्यावरणीय शैली को प्रभावित करता है। सीमेंट और रेते का न्यूनतम प्रयोग जहां नदियों के खनन को कम करता हैं, वहीं पुरानी ईंटो का प्रयोग खेतों से हो रहे बालू के खनन को भी कम करता है।


ढाबे के प्रयोग में लाया गया फर्नीचर पूरी तरह से पुरानी लकड़ी का है जो इसे एंटीक लुक देता है, यहां ट्रक और ट्रैक्टर के पुराने टायरों को रंगकर बनी स्पेशल बडी टेबिल यहां आने वाले युवाओं के सेल्फि लेने की पसंदीदा जगह है। विक्रमजीत बताते हैं कि इमारत में प्रयोग सभी दरवाजे पुराने हैं जो पहले किसी घर में प्रयोग हुए हैं। इन्हें अधिक पैसा देकर इसलिए खरीदा गया ताकि नए पेड़ न काटने पड़ें। छत में मटके के ढक्कन को उल्टा करके इस अंदाज मेंं प्रयोग किया गया है कि ये इसके लुक को भी बढ़ाते हैं और लेंटर को ठंडा भी रखते हैं।


ढाबे में प्रयोग हुआ सारा पानी एक संयंत्र के जरिए साफ होकर बाथरूम और टॉयलेट में प्रयोग होता है। केवल रसोई के प्रयोग और पीने के लिए ही साफ पानी इस्तेमाल किया जाता हैं। रेन वाटर हारवेस्टिंग के जरिए सारा पानी ढाबे के पीछे बने तीन बड़े टैंकों में चला जाता है। इससे अगले तीन वर्ष में न केवल ढाबे बल्कि उसके आस पास के भूगर्भ जल में 3 से 4 फीट का इजाफा हो जाएगा।


अब रेस्टोरेंट की रसोई का जिक्र न किया जाए तो पेट कहां मानेगा। तो जान लीजिए कि रसोई में दिन भर रोशनी रहे इसके लिए छत को इस तरह से बनाया है कि सूरज का प्रकाश और हवा दोनों अंदर आते रहें। रसोई में पानी गर्म करने के लिए सोलर वॉटर हीटर लगा है। खाना पकाने के लिए एलपीजी गैस का इस्तेमाल नहीं होता। ढाबे के पीछे ही एक बायोगैस संयंत्र लगा हुआ है जो पूरे ढाबे के खाने को पकाने में मदद करता है। इसलिए इस आंच पर सिकी रोटियां या सब्जियां आपको बिल्कुल नुकसान नहीं पहुंचाते। प्रेम बेदी का दावा है कि यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा निजी बायोगैस संयंत्र है।


तंदूर पर बनी स्पेशल गुड, देशी घी पिघलाकर लपेटी गई रोटी खाने के बाद यहां परोसे जाने वाली विशेष डेजर्ट है जो आपको उत्तर प्रदेश में कहीं नहीं मिलेगी। आप यहां का खाना क्यों खाएं इस सवाल का जवाब तो आपको मिल गया होगा, लेकिन ये औरों से अलग क्यों होगा इस सवाल का जवाब नहीं मिला तो हम बताते हैं। ढाबे के पीछे स्थित हैं बेदी परिवार के अपने खेत जहां दैनिक प्रयोग में आने वाली सभी सब्जियां जैसे बैंगन, मटर, टमाटर, हरी मिर्च, प्याज, लेहसुन, गोभी, पत्ता गोभी, धनिया, पोदीना, इसके अलावा चावल, गेहूं, सरसों, पालक आदि सभी उगाए जाते हैं। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। यहां से उगने वाली सब्जियां इस ढाबे के अलावा शहर में संचालित इनके तीन अन्य ढाबों की भी पूर्ति करते हैं। दाल मखनी के उड़द उनके अपने खेत के ही होते हैं और खाने में प्रयोग किया जाने वाला सरसों का तेल भी अपने खेत की सरसों का ही होता है।


विक्रम और प्रेम की मां डा. मधु चतुर्वेदी प्रतिष्ठित हिंदी कवियत्री हैं और प्रसिद्ध कवि बिहारी की आठवीं पीढ़ी से हैं। लिहाजा साहित्य के प्रति परिवार काफी समर्पित है। सो आव भगत में भी कोई कसर नहीं है। आप यदि यहां पहुंचते हैं तो सबसे पहले आपका स्वागत पानी से होता है। फिर आपको पूरा ढाबा घुमाया जाता है और उसकी बारीक चीजें समझाई जाती हैं, और यदि बच्चे संग हैं तो कहना ही क्या, उन्हें तो खेत घुमाना, सब्जियां दिखाना, ढाबे से पर्यावरण को क्या दिया जा रहा है ये समझाना पूरे परिवार को बहुत अच्छा लगता है।

इसके बाद आपको जो खाना है वो बताइये या अपने सामने ही खेत से सब्जी तुड़वाकर ताजी बनवा लीजिए। आपके जायके के लिए डाला जाने वाला हर एक मसाला रसोई में रखी एक छोटी सी मापनी से नाप तोल कर डाला जाता है। इतना लजीज खाना खाने के बाद अगर आपकी थाली में कोई सब्जी बच जाती है और आपको दिल से बुरा लग रहा है कि आप ये खाना बेकार कर रहे हैं तो अफसोस मत करिए क्योंकि उस खाने को फेंका नहीं जाएगा बल्कि बायोगैस संयंत्र में डाल दिया जाएगा जिसकी खाद खेत की सब्जियों में प्रयोग होगी और गैस रसोई का खाना पकाने में। यानी आपने जो खाना खाया है वो पूरी तरह से आर्गेनिक खेती की सब्जियों का है जो आपके शरीर को बिल्कुल नुकसान नहीं पहुंचाते।


ढाबा संचालक प्रेम और विक्रम बताते हैं कि अक्टूबर 2014 में इसे शुरू किया गया। अभी इसे लेकर काफी विचार हैं। जल्द ही यहां तिहाड़ जेल के कैदियों द्वारा बनाया फर्नीचर दिखाई देगा। इसके अलावा कई पुरानी चीजें, आस पास इको सिस्टम के मुताबिक औषधिय और छायादार वृक्षों का वातावरण भी तैयार किया जा रहा है। पास के ही खेत में एक देसी स्वीमिंग पूल बनाया जाऐगा जिस पर टयूबवेल लगा होगा। जो आपको पिंड यानि गांव की याद दिलाएगा।

दोनों बताते हैं कि यह पर्यावरण मित्र इमारत को बनाने में काफी समय लगा और मेहनत भी। इसके आर्किटेक्ट तनु भटट और उनके सहयोगी सूर्यमणि पहले मजदूरों को करीब एक घंटे तक वो चीज समझाते जो उन्हें एक दिन में बनवानी होती थी। इसके बाद मजदूर उसी तरह से बनाते क्योंकि इस तरह की इमारत यहां आसपास नहीं बनाई गई थी। भाइयों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान या घर की इमारत को इसी कनसेप्ट पर बनाना चाहता है तो वह उनकी बहुत खुशी-खुशी मदद करना चाहेंगे। ये एक विचार है जिसे नई पीढ़ी को हासिल करना चाहिए। जिससे पर्यावरण को अधिक से अधिक वापस किया जा सके।

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