बिना निष्कर्ष ही बंद हो गईं जांच की फाइलें

Moradabad Updated Thu, 27 Dec 2012 05:30 AM IST
केस वन- आठ नवंबर 2011 को संभल रोड स्थित एक नर्सिंग होम मेें आधी रात के वक्त मरीज पहुंचे। आरोप है कि डाक्टर व स्टाफ ने उन्हें बदमाश समझकर फायरिंग की। मैनाठेर थाने में मुकदमा दर्ज हुआ। मामला शासन स्तर तक पहुंचा। बाद में स्वास्थ्य विभाग ने भी जनवरी 2012 में जांच शुरू की लेकिन ये प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकी। सीएमओ के ट्रांसफर के बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
केस टू- तीस मई 2012 को सिविल लाइंस स्थित आर्थोपैडिक सेंटर में अग्निकांड के बाद दो तीमारदारों की मौत हो गई। मामले ने तूल पकड़ा, स्वास्थ्य महकमे ने भी जांच शुरू की। बड़े दावे किए गए। चार दिन तक तो जांच कमेटी को यही पता नहीं लग सका कि क्लीनिक में लगा ताला किसका है। शुरुआती तेजी के बाद जांच प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
केस थ्री- 16 सितंबर 2012 को असालतपुरा के एक नर्सिंग होम में बच्चे को कोख में बेचे जाने का मामला सामने आया। सिविल लाइंस पुलिस ने एक आशा कार्यकत्री को पकड़ा। शिकायत के बाद गर्भवती को महिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। सीएमओ ने जांच कमेटी गठित की। महिला अस्पताल की सीएमएस ने भी पत्र लिखा लेकिन प्रारंभिक दौर की पूछताछ तक नहीं की गई।

अमर उजाला ब्यूरो
मुरादाबाद। स्वास्थ्य महकमे में जांच के नाम पर बड़ा ‘खेल’ चल रहा है। निजी अस्पतालों व डाक्टरों के खिलाफ शिकायती पत्रों पर जांच शुरू करने की बात तो खूब कही जा रही है लेकिन जांचों के नाम पर बस कागजी खानापूर्ति की जा रही है। मेडिकल बोर्ड के सदस्य जांच शुरू होने से पहले ही उसे धड़ाम कर रहे हैं। अफसर भी जांचों की मानीटरिंग नहीं करते।
किसी नर्सिंग होम में मरीजों के साथ दुर्व्यवहार की बात हो या फिर इलाज के नाम पर अनाप शनाप बिल की वसूली का मामला हो। चिकित्सीय पेशे को बदनाम करने वाली ऐसी शिकायतों को लेकर महकमा गंभीर नहीं होता है। जिले की बात करें तो वर्ष 2012 में विभिन्न मामलों की शिकायतों पर सात मामलों में जांच कमेटियां बनाई गईं लेकिन एक भी मामले में जांच प्रक्रिया मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है।

क्या हैं नियम
मुरादाबाद। यूपी में नर्सिंग होम एक्ट अस्तित्व में नहीं है। ऐसे में यदि कोई डाक्टर पेशे के अनुरूप आचरण में लिप्त पाया जाता है तो स्वास्थ्य विभाग मात्र उसका रजिस्ट्रेशन कैंसिल करने की सिफारिश मेडिकल काउंसिल को कर सकता है।


क्या कहते हैं अफसर
‘शिकायतों के आधार पर संबंधित जिलों के सीएमओ को जांच करने को कहा जाता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में शिकायतकर्ता ही ट्रेस नहीं हो पाते हैं, इसके चलते जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती है’
- डा. महावीर सिंह, एडी हेल्थ, मुरादाबाद मंडल।

‘ जांच प्रक्रिया में सबसे ज्यादा दिक्कतें गवाहों के न होने से होती है, शिकायतकर्ता भी कई बार गायब हो जाते हैं, महकमे के पास अधिकार भी सीमित हैं, जब मुद्दई व गवाह ही नहीं आएंगे तो जांच कैसे पूरी होंगी ’
- डा. संजीव यादव, सीएमओ, मुरादाबाद।

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