शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदी किया मंत्रमुग्ध

Moradabad Updated Sat, 08 Sep 2012 12:00 PM IST

मुरादाबाद। मोहन वीणा और तबले की जुगलबंदी पर स्रोताओं मंत्रमुग्ध होकर रह गए। हर कोई संगीत की सागर में गोते लगाते हुए दिखाई दे रहा था। संगीतमयी शाम के शाम के एक पल को भी छोड़ना किसी को गवारा नहीं था। चित्त और मस्तिष्क स्थिर था केवल हाथ और पैर संगीत की धुन पर ताल मिल रहे थे। ऐसा ही कुछ नजारा था टीएमयू के सभागार पंडित विश्वमोहन भट्ट और सुधीर पांडे की जुगलबंदी के अवसर पर।
टीएमयू में चल रहे यूपी स्टेट कंवेशन के तहत स्पीक मैके कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति की धूम रही। टीएमयू का परिसर भारतीय संस्कृति और संगीत की सुगंध से महक उठा। शुक्रवार को सर्वप्रथम डा. माहेश्वर तिवारी के साथ सांस्कृतिक विरासत पर परिचर्चा आयोजित की गई। शाम को पंडित केवल्य कुमार गौरव की मधुर आवाज ने भारतीय संगीत को साकार किया। उनकी शास्त्रीय आवाज का जादू मुरादाबाद के स्रोताओं पर जमकर चला। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पद्मश्री विश्वमोहन भट्ट और सुधीर पांडे की जुगलबंदी ने यादगार रही। मोहन वीणा और तबले से निकले राग कानों के माध्यम से सीधे दिल के तारों को झंकृत कर रहे थे। इन दोनों ने मारू बिहाग पर लोगों को बांधकर रख दिया। अतुलनीय और अवर्णनीय प्रस्तुति को मुरादाबाद के लोगों ने पहली बार सुना। सभागार में मौजूद स्रोता गदगद थे। इस अवसर पर डा. आरसी गुप्ता राज्य सचिव स्पीक मैके, डा. मुकुल किशोर चेयरपर्सन स्पीक मैके मुरादाबाद और टीएमयू के वाइस चांसलर आरके मित्तल सहित शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे।


छोटे शहरों में भी शास्त्रीय संगीत के जानकार
भारतीय संस्कृति और संगीत को समझने वाले अब हर जगह हैं। छोटे शहरों में भी शास्त्रीय संगीत को पसंद करने वाले मिल जाते हैं। अब स्रोता पहले से कहीं अधिक परिपक्व और विचारवान है। यह कहना है ग्रेमी अवार्ड विजेता पद्मश्री पंडित विश्वमोहन भट्ट का। उन्होंने कहा अपनी संस्कृति और संगीत को सहेजने के लिए नई पीढ़ी आतुर है। इससे लगता है कि भारतीय विरासत सुरक्षित है। अपने आविष्कार मोहन वीणा से नवीन प्रयोग और उन्होंने अलग ही पहचान बनाई है। हाल यह था कि टीएमयू में उनकी प्रस्तुति को सुनने के लिए बनारस, दिल्ली, कोलकाता और देश के विभिन्न हिस्सों से प्रशंसक पहुंचे। भट्ट जी भारत के प्रमुख शहरों के साथ यूएसए, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे देशों में अपनी प्रस्तुति से लोगों को अपना दीवाना बना चुके हैं। जिसके चलते उन्हें ग्रेमी अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है।


संस्कृति के बल पर मिलती है पहचान
सांस्कृतिक विरासत पर परिचर्चा के दौरान डा. माहेश्वर तिवारी ने संस्कृति की उत्पत्ति, स्वरूप और निर्माण प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कला माध्यम संस्कृति के उत्प्रेरक हैं। संस्कृति के प्रचार और प्रसार में कला माध्यमों की विशेष भूमिका होती है। व्यक्ति की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। कोई भी व्यक्ति और समाज इसके बिना अधूरा है। अपनी विशिष्ट संस्कृति के बल पर ही अलग पहचान हासिल होती है। यह लंबे अनुभवों के बाद तैयार होती है। समय के साथ बदलाव भी होते हैं। लेकिन हमारी जिम्मेदारी बनती है कि उसकी रक्षा के साथ पोषित करें।

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