पांच दिनों की ‘ मानसिक यातना’ का हिसाब कौन देगा?

Moradabad Updated Mon, 18 Jun 2012 12:00 PM IST
मुरादाबाद। याद कीजिए कुछ दिनों पहले की वह मासूम गुहार...अंकल मैं बेकसूर हूं, मैंने कुछ नहीं किया मैं तो गार्गी से मिली भी नहीं थी उसने मेरा नाम क्यों लिया...मैं नहीं जानती। रोहित के बयानों को सच मानें तो पुलिस की शिकंजे में गिड़गिड़ाने वाली मासूम छात्रा बिल्कुल सच बोल रही थी। हालात और जांच के बाद अमर उजाला ने भी गार्गी की सहेली की इस कांड में संलिप्तता न होने की बात की तस्दीक कर दी थी और अब यह एक तरह से साबित हो गया है कि गार्गी कांड में उसकी सहेली का हाथ नहीं था। पांच दिनों तक उसकी सहमी आंखों से बह रहे आंसुओं, नारी निकेतन की ‘कैद’...घिनौने आरोपों का बोझ और उन दिनों में जो घाव उसके दिल पर हुए क्या उसका हिसाब ताउम्र कोई दे पाएगा? शायद नहीं।
कम उम्र की गलती की बहुत बड़ी सजा चुकाई गार्गी ने। उसने तो आत्महत्या कर लिया लेकिन मौत से पहले बोला गया उसका एक झूठ एक ‘निर्दोष’ मासूम की जिंदगी बर्बाद करने वाला था। अपनी दसवीं में पढ़ने वाली सहेली पर उसने आरोप लगाया था कि वह साथ ले गई और दरिंदों के हाथ सौंप दिया जहां गैंगरेप किया गया। पिता ने उसी झूठ को सच मानते हुए सहेली के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया। परिजनों को तो एक बार सही भी ठहराया जा सकता है कि मौत से पहले अपनी बेटी द्वारा बोले गए झूठ को सच मानकर उन लोगों ने मुकदमा दर्ज करा दिया लेकिन पुलिस ने ऐसी जल्दबाजी क्योंकि? यह सवाल अगले ही दिन से गूंजने लगा था। पहले ही दिन से गार्गी की सहेली की संलिप्तता न होने के सुबूत मिलने लगे थे लेकिन इंतजार करने के बाद पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया। फिर तो एक मासूम छात्रा कभी जिला अस्पताल में मेडिकल कराती रही तो कभी उसकी उम्र की तस्दीक हुई। कभी कोर्ट में पेश हुई और पांच दिनों तक नारी निकेतन की दिवारों के बीच कैद रही। इन पांच दिनों में उसके आंसू रुके नहीं थे वह नारी निकेतन में भी खुद को बेकसूर बताती रही। बाद में उसे पिता के सुपुर्दगी में दे भी दिया गया था। पर उसने जो एक जून से पांच जून के बीच जो मानसिक यातना झेली उसको मिटाया नहीं जा सकता।

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