परंपराओं ने जिंदा रखी है पीतल की चमक

Moradabad Updated Tue, 22 May 2012 12:00 PM IST
मुरादाबाद। हैंडीक्राफ्ट में भले ही पीतल का इस्तेमाल हाशिए पर पहुंच गया हो लेकिन देश की पौराणिक परंपराओं की वजह से पीतल कारोबार कम से कम देश में तो फल फूल रहा है। कारोबारियों की मानें तो करीब एक साल में आठ सौ करोड़ रुपये के पूजा के सामान मुरादाबाद से देश के दूसरे हिस्सों में भेजे जाते हैं।
निर्यात कारोबार के लिए ही जाना जाता है अपना मुरादाबाद। हस्तशिल्प में जैसे-जैसे पीतल का इस्तेमाल सरकता जा रहा है तमाम कारोबारियों ने खुद को देश में ही समेट लिया है। दक्षिण भारत के चार राज्य तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के अलावा महाराष्ट्र, उड़ीसा, बंगाल और आसाम में पीतल नगरी में तैयार होने वाले पीतल के उत्पादों की सबसे अधिक खपत होती है। महानगर के पीतल कारोबारी बताते हैं कि उपरोक्त प्रांतों में इस अत्याधुनिक दौर में पूजा करने की पौराणिक विधि अब भी जीवित है। वहां दीपक का इस्तेमाल खूब होता है। जो भी पूजा करने जाता है वह दीपक, आरती थाल, छोटे लोटे (तांबे) और घंटी अपने साथ ले जाता है। आरती के बाद उसी मंदिर में उस दीपक को दान कर देता है। यही वजह है कि तिरुपति बालाजी, मीनाक्षी, पद्मनाभम, व्यंकटेश्वर मंदिर का स्टोर सैकड़ों टन पीतल के सामान से भरे होते हैं। खास बात यह भी है कि इन मंदिरों में बड़े-बड़े ज्योत और घंटा दान करने का प्रचलन बखूबी है। इसके अलावा अन्न परासन जैसे छोटे स्तर पर होने वाले शुभ कार्य में भी इन राज्यों में नए और वह भी पीतल के बर्तन ही इस्तेमाल होते हैं। यहां तक कि बच्चों को आशीर्वाद देने आने वाले शुभ चिंतक और परिजन भी पीतल के बर्तन ही भेंट करते हैं। कमोबेश यही स्थिति महाराष्ट्र, बंगाल, उड़ीसा व आसाम का है। महाराष्ट्र में गणपति महोत्सव के मौके पर बड़े दीपकों की मांग बेशुमार होती है। इन तमाम राज्यों में पीतल और तांबे के उत्पादों की पूर्ति सिर्फ और सिर्फ पीतल नगरी ही करता है। पूजा के अलावा घरों की साज सज्जा में उपयोग आने वाले पीतल के सामान की पूर्ति भी विदेशी बाजार के अलावा घरेलू बाजार में पीतल नगरी ही करता है। कोराबारी विकास जैन का कहना है कि मुरादाबाद के पीतल कारोबार को ईष्ट देवों की पूजा में इस्तेमाल होने वाले बरतनों ने ही मुरादाबाद की पहचान बनाई है। खास बात यह है कि उन बरतनों में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों को तैयार करने में पीतल नगरी का इस देश में कोई जोड़ नहीं है। एक अन्य व्यवसायी अरविंद अग्रवाल का कहना है कि बड़े स्तर पर पूजा में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों की भारी मांग की वजह साउथ के लोगों की आस्था और मुरादाबाद की कलाकारी प्रमुख है। यहां के दस्तकारों में बेहतर उत्पाद तैयार करने की अकूत क्षमता है। दीपक अग्रवाल का कहना है कि यह एक साउथ के राज्यों समेत अन्य गैर हिन्दी भाषी राज्यों भारी तादाद में पीतल और तांबे के बरतनों की खपत का कारण पौराणिकता को जीवित रखना है। खास बात यह भी है कि इन राज्यों में हलके पीतल या तांबे के बरतनों का नहीं बल्कि वजन वाले उत्पादों की डिमांड अधिक है।

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