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पब्लिक के विश्वास के साथ आठ माह तक ‘छल’

Moradabad Updated Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
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मुरादाबाद। इसे जनता के साथ छल ही कहेंगे। चुनावी सुगबुगाहट से पहले ही अफसरों ने लखनऊ से आने वाले आदेश और फाइलों को दबाना शुरू कर दिया था। आचार संहिता तो दिसंबर में लागू हुई थी लेकिन उससे बहुत पहले सितंबर में ही जरूरी जांच, महत्वपूर्ण शासनादेश को अलमारियों में बंद कर दिया गया। अफसरों की सोच शायद यह रही कि अब जो भी होगा नई सरकार में देखेंगे। पब्लिक की आवाज दबाकर अफसर तो निकल गए लेकिन निजाम की इस ‘धोखाधड़ी’ से लाखों लोगों को नुकसान उठाना पड़ा है। तबादलों की आंधी के बाद अब फाइलें निकली हैं और उन पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं।
पब्लिक के लिए तो अफसर आठ महीने पहले ही ‘छुट्टी’ पर चले गए थे। चौंकिए नहीं इसे छुट्टी ही तो कहेंगे। क्योंकि चुनावी गतिविधियां शुरू भी नहीं हुई थीं और उससे पहले ही सरकार बदलने की मंशा लिए अफसरों ने एक तरह से काम पर ब्रेक लगा दिया था। कहीं फंस न जाएं? इसका डर हो या फिर चुनाव बाद नई सरकार का रुख देखकर फैसला करेंगे की सोच जो भी हो लेकिन यह तय है कि इन दिनों में जनता की फिक्र नहीं रही। यूं तो सरकारी मशीनरी की इस मनमानी के तमाम किस्से सामने आ रहे हैं लेकिन हम आपके समक्ष रख रहे हैं उन मसलों को जिनसे जनता बुरी तरह प्रभावित हुई।

तहसील दिवस में लंबित सूचनाओं का ब्योरा: शासन ने अक्तूबर में आदेश जारी करके तहसील दिवस में लंबित शिकायतों का ब्योरा मांगा था। किस विभाग की कितनी शिकायतें हैं इस पर रिपोर्ट देनी होगी लेकिन आपको यह जानकर अचरज होगा कि यह शासनादेश संबंधित पटल पर बीस अप्रैल में तब पहुंचा जब सरकार बदल गई और तहसील दिवस भी खत्म हो गए।

आय प्रमाण पत्र की सीमा बढ़ा दी गई: जनता के लिए बड़ी राहत वाली यह सूचना भी तहसीलों में ठीक छह महीने बाद पहुंची है। सितंबर माह में इसका शासनादेश जारी किया गया था लेकिन अप्रैल में अफसर इसकी जानकारी दे रहे थे। दरअसल यह फरमान तो लखनऊ में ही दबा दिया गया। स्थानीय स्तर पर भी अफसरों की कोठी पर जाने वाली डाक में यह पत्र दबे रह गए।
मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग के सचिव पवन भारद्वाज ने 22 अगस्त को पत्र भेजकर कई मामलों में लंबित रिपोर्ट पर रिमाइंडर जारी किया था। लेकिन यह पत्र भी फाइलों में कहीं खो गया। अप्रैल में पहुंचा है जब पूरी मशीनरी ही बदल गई। अब किसकी लापरवाही रही। कौन जिम्मेदार है इसकी पड़ताल हो तो कुछ पता चले।
कांशीराम योजना पर जारी किया गया था फरमान: कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना के लिए भी सितंबर में आदेश जारी किया गया था। प्रशासन से पूछा गया था कि जो आवास बनवाए गए हैं उनकी क्या स्थिति है। लेकिन संबंधित डिपार्टमेंट में यह पत्र तब पहुंचा जब इस बिंदु पर कोई सुनवाई ही नहीं हो रही। अब यह डाक लखनऊ में फंसी रही या फिर प्रशासन ने कोई तवज्जो नहीं दी यह भी जांच का विषय है।


अप्रैल में खुली अक्तूबर नवंबर की डाक
मुरादाबाद। तमाम शासनादेश। दर्जनों जांच रिपोर्ट। सैकड़ों विभागीय रिमाइंडर। ऐसी चिट्ठियां जिन पर जवाब दाखिल हो जाना चाहिए था वह यूं ही पड़ी रह गईं। पेंशन योजना, वजीफा, ग्रामीण विकास के कार्य, आवासीय योजनाएं, पेयजल योजना और शस्त्र लाइसेंस से संबंधित पत्र अब संबंधित पटलों पर जारी हो रहे हैं। तमाम चिट्ठियां तो ऐसी हैं जिनका समय भी खत्म हो चुका है। अधिकारियों का कहना है कि दरअसल वह लोग चुनावी तैयारियों में थे। आचार संहिता भले ही दिसंबर में लगी लेकिन तैयारियां तो अक्तूबर से ही शुरू हो गईं थीं। जिसके कारण डाक समय से दुरुस्त नहीं हो पा रही थी।

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