गीता मजहब या संप्रदाय का साहित्य नहीं

Mirzapur Updated Mon, 17 Dec 2012 05:30 AM IST
शक्तेषगढ़ (मिर्जापुर)। आदि धर्मशास्त्र गीता है। गीता के मूलभाव को सभी धर्मों और राष्ट्रों ने माना है, इसलिए भी गीता श्रेष्ठतम है। मनु ने कृष्ण से स्मृति के आधार पर ही इसे आत्मसात किया था, इसलिए असली मनुस्मृति भी गीता है। यद्यपि विश्व में सर्वत्र गीता का समादर है फिर भी वह किसी मजहब या संप्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी, क्योंकि संप्रदाय किसी न किसी रूढ़ि में जकड़े हुए हैं।
परमहंस महाराज स्वामी श्रीअड़गड़ानंद जी ने यह बात रविवार को शक्तेषगढ़ स्थित आश्रम में प्रात:कालीन श्रद्धालुओं को संबोधित करते समय कही। गीता को समर्पित यह संत पौ फटने के साथ भीषणकोहरे में विंध्य की पहाड़ियों में अपने शिष्यों को ब्रह्मविद्या का ज्ञान देते नजर आए तो कुछ समय बाद आमजन को गीता का सार उन्हीं की भाषा में समझाते मिले। अपने संबोधन के दौरान किसी बच्चे के रुदन से यह संत खीझ नहीं निकालता है, बल्कि कहता है, सुनो इसका रुदन सुनो, मुझसे उम्दा प्रवचन कर रहा है। दोपहर के भंडारे के पहले अपने जन्मदिन पर एक बच्चा आकर आशीर्वाद लेता है तो कहते हैं-आज का भंडारा तुम्हारे जन्मदिन पर। पर इन्हीं सारी दिनचर्या के बीच उनका सारा ध्यान गीता को आम लोगों में प्रचारित और प्रसारित करने में लगा रहता है।

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