दहेज में लिया था चरखा और मोटी खादी

Mirzapur Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
मिर्जापुर। भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। उनकी जिह्वा से अहिंसा की ही भाषा निकलती थी, उनकी आंखाें में विनयशीलता का पानी था। शास्त्री जी का कद छोटा था पर व्यवहार, सोच और कृतित्व ने उनके व्यक्तित्व को विराट बना दिया था। आज दो अक्तूबर को उनकी जयंती पर पूरा राष्ट्र जब उन्हें नमन करता है तो इस जिले जहां शास्त्री जी की ससुराल व ननिहाल दोनों ही है के युवा उनसे प्रेरणा पाते हैं।
लाल बहादुर शास्त्री भारतीय राजनीति में उस वामन अवतार के समान थे, जिसने दो पग में समूचे ब्रम्हांड को नाप कर तीसरे पग में बलि का मान भंग कर उसे पाताल में भेज दिया था पर उसे मुक्ति भी दी थी अर्थात् अपने को ही उसके प्रति समर्पित कर दिया था। उसी प्रकार शास्त्री जी भी जितने दृढ़ प्रतिज्ञ थे उतने ही कोमल भी। जीवन से संघर्षों से जूझते हुए वे धीरे-धीरे प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे थे। इसीलिए उनकी सहानुभूति सदा जन साधारण के साथ रही। 1928 में वे हरिजन सेवा के काम में लगे थे, उसी समय उनका विवाह लालमनी से हो गया। ससुराल में बहू को नाम दिया गया- ललिता देवी। यह एक आदर्श विवाह था। वर ने एक रुपये में तिलक कराया और विवाह के समय दहेज में लिया- एक चरखा और कुछ गज मोटी खादी। वह जनता के लिए जिए और जनता की सेवा में ही खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने धर्म, दर्शन की नगरी काशी में शिक्षा पाई।बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उद्घाटन करने आए गांधी जी का भाषण सुनकर वह बहुत प्रभावित हुए और देशसेवा से जुड़ गए। लगातार जेल यात्राओं से शास्त्री जी के इरादे मजबूत होते गए, तो परिवार की आर्थिक दशा बिगड़ती गई। एक समय सुहाग की एक दो निशानी छोड़कर ललिता जी के सारे जेवर बिक गए थे। उन्होंने जिंदगी में वह सब भोगा जो यहां की बड़ी आबादी भोगती है। वे पूरी जिंदगी जनता से जुड़े रहे। प्रधानमंत्री साधारण कुर्ता पहने, उनके बच्चे दिल्ली परिवहन की बसों में बैठकर पढ़ने जाएं, यह आदर्श वही रख सकते थे। वे नव जागरण के उन थोड़े से शिल्पकाराें में थे, जिनके पास भावी भारत की एक सुविचारित परिकल्पना थी। भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी ने भारत और मानवता की उत्कृष्ट सेवा की। दुनियां में भारत की प्रतिष्ठा कायम रखने के लिए अपने जीवन का प्रतिपल समर्पित कर दिया। शिक्षा शुरु करने के पहले ही वह राष्ट्र सेवा में जुट गए थे। शास्त्री जी जनता के सामान्य वर्ग के व्यक्ति थे। उसी में पैदा हुए, जीवन भर मन से भी तन से भी उसी के साथ रहे और उसी की सेवा करते हुए दुनिया को अलविदा कर गए। आज पूरा राष्ट्र उनको सच्चे ह्दय से नमन करता है।

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